सही दिशा में की गयी मेहनत से पूरे होते हैं सपने - डा0 संजय कपूर

Posted by: Publlic Akrosh ADMIN Monday 31st of August 2015 05:24:10 PM

 

कानपुर शहर के जाने माने उद्योगपति व के.डी.एम.ए स्कूल और कानपुर क्रिकेट एसोसिएशन के चेयरमैन डा0 संजय कपूर आज के युवाओं के लिए एक मिसाल बन चुके हैं। चाहे वो शिक्षा का क्षेत्र हो, खेल का मैदान या फिर समाज सेवा का कार्य, इन्होनें हर क्षेत्र में शहर के युवाओं को वो मंच दिया जिसको वो सालों तक नहींे भूल पायेगें। मेहनत और लगन से सपनों को पूरा करने की सोच को वो आज के युवाओं में देखना चाहते हैं। अपने व्यस्त कार्यक्रमों के बीच उन्होनें कुछ पल बिताये हमारे चीफ एडिटर डा0 प्रदीप तिवारी जी के साथ। प्रस्तुत है उनसे खास मुलाकात के कुछ प्रमुख अंश -     


संजय जी, आज आप इस मुकाम पर पहुँच कर कैसा महसूस करते हैं और आप अपना प्रेरणास्त्रोत किसे मानते हैं ?
आज मैं, मेरे भाई और मेरा परिवार जिस मुकाम पर हैं, सब ईश्वर की देन है और मेरे पिता जी का आर्शिवाद है। ईश्वर ने हम लोगों पर बहुत कृपा बरसायी है। ईश्वर का दिया हुआ सब कुछ है हमारे पास।

आपके एक बड़े भाई राजनीति मंे है, दूसरे भाई इण्डस्ट्रियलिस्ट व समाज सेवक है। फिर आपने शिक्षा और खेल के क्षेत्र को क्यों चुना ?
देखिये इस क्षेत्र को चुनने की दो वजह रहीं पहली की शिक्षा एक ऐसा क्षेत्र रहा जो मुझे शुरु से ही अट्रैक्ट करता रहा। दूसरा ये सब भाग्य पर निर्भर करता हैै कि कौन किस क्षेत्र में जायेगा। जब हम लोग छोटे होते हैं, तो ये सोचते नहीं है कि हमें क्या करना है। अब ऐसा प्रारुप बना कि मेरा मन शिक्षा के क्षेत्र मंे रम गया। 

आप शिक्षा के क्षेत्र मंे हैं, के.डी.एम.ए चलाते हैं जो शहर का नामी स्कूल है, मगर यहँा तमाम बच्चे गरीब वर्ग से भी हैं, उनके लिए भी क्या आप कुछ सहायता करते हैं ?   
जी बिल्कुल, हम कानपुर में ही एक शिक्षा सदन भी चलाते हैं, जहाँ गरीब व निम्न वर्ग के बच्चों को मुफ्त शिक्षा दी जाती है।
क्या ये स्कूल भी आप की देखरेख में चलता है ? 
देखिये हमारा परिवार एक संयुक्त परिवार है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि कौन क्या देखता है। फर्क इस बात से पड़ता है कि आप करते क्या हैं। जैसा आपने कहा एक भाई हमारे राजनीति में है। उनके राजनीति में रहते क्या हम पर प्रभाव नहीं पड़ता, सौ प्रतिशत पड़ता है। क्योंकि परिवार ये एक ही है, और मुझे नहीं लगता कि संयुक्त परिवार में कोई चीज बटी होती है। 

आपके स्कूल के सबसे पहले विज्ञापन की एक पंक्ति थी,‘ एक सोच थी, एक सपना था ’ इस सपने को कहाँ तक साकार हुआ मानते हैं ?
सच बोलूं तो, जो मेरे जो मन में आया मैंने किया, मैंनंे स्कूल इसलिये नहीं बनाया कि बस स्कूल बनाना है। चार कमरे बनाकर कामर्शियलि उसे चलाना, बिलकुल नहीं। मैंने अपने बच्चों की अभिलाषा सोची, जो एक आम बच्चे को चाहिये वो सोचा, जो मैं कर पा रहा था किया। एक ऐसा विद्यालय स्थपित करने की कोशिश की जो कि अपने आप में फ्यूचरस्टिक हो। मैनें जो विद्यालय बनाया, एक दिन के लिये नहीं बनाया, मैनें 100 साल आगे की सोचकर विद्यालय बनाया। इसीलिए इसे ‘एक सोच’ कहा। सपना इसलिये कहा गया कि इस प्रकार के विद्यालय वाकई एक सपना हैं। इसी विचार के साथ वो पंक्तियां लिखी गयीं थी,‘ एक सोच थी, एक सपना था, बने कोई स्कूल हमारा।’ आप मान लीजिए कि चार इंजीनियरिंग काॅलेज जितने में बन जाते हंै उतने मंे एक स्कूल बनता है। मैंने कार्मशियल वैल्यू देखकर स्कूल नहीं बनाया बल्कि इसलिए बनाया कि बच्चों को ज्ञान दिया जा सके।  


पहले कानपुर मंे शिक्षण संस्थानों की कमी थी, लेकिन अब कई उच्च स्तर के शिक्षण संस्थान खुल गये हैं। बच्चों के एडमिशन के समय पैरेन्टस् को किन बातों का ध्यान रखना चाहिए। इस विषय पर आप क्या कहना चाहेंगे ?
मैं तो कहूंगा उन्हें जो अच्छा लगे वो केंर। मैं आपको एक बात बताना चाहूंगा हर पैरेन्ट्स अपने बच्चे के लिये बेस्ट चाहता हैं क्योंकि मैं ऐज ए पैरेन्ट यही सोचता हूँ आखिर वो पैरेन्टस है और उन्हें अपने बच्चे के भविष्य के लिए जो बेस्ट लगे वही करना चाहिये।

आप खेल जगत से भी जुड़े रहते हैं और कानपुर क्रिकेट एसोसिएशन बोर्ड के चेयरमैन भी हैं। बोर्ड की पहले और अब की स्थिति में आप क्या फर्क देखते हैं और आपने अभी तक बोर्ड के लिए क्या किया है ? 

जिस सन् में मैं कानपुर क्रिकेट एसोसिएशन बोर्ड का चेयरमैन हुआ, तब एसोसिएशन का बजट 2 लाख था और आज मात्र 5 सालों में इसका बजट 48 लाख रुपये है। तो मुझे नहीं लगता कि अब भी मैं किसी को बताऊं कि मैंने एसोसिएशन के लिए क्या किया। 

हमारे यहँा जो खेल से जुड़ी अनेकों प्रतिभाएं हैं, उनका भविष्य आप कहँा पर देखते हैं ?

क्रिकेट इस देश में एक धर्म है। क्रिकेट खेलने के लिये बच्चे लालाईत रहते हैं। मुझे तो लगता है इस देश का प्रथम खेल हाॅकी की जगह क्रिकेट हो। इसमें लोग बहुत इंन्ट्रेस्टेड रहते हैं। क्रिकेट को और धर्म को लोग एक तरह मानते हैं। इसलिए क्रिकेट स्वावलंबी है हिन्दुस्तान में। मुझे लगता है कि क्रिकेट बहुत आगे जायेगा और क्रिकेट खेलने वाले बच्चे भी बहुत आगे जायेंगे। 

आप को कौन सा गेम पसंद है ?
मैं खुद एक क्रिकेटर हूँ। इसके साथ ही मैं उत्तर प्रदेश चेस एसोसिएशन का अध्यक्ष भी हूूँ। क्रिकेट के साथ-साथ मैं स्क्वैश, बैटमिंटन व टेबिल टेनिस भी खेलता रहा हूँ। चेस एसोसिएशन से जुड़े होने के नाते हम लोग उत्तर प्रदेश में इसके लिये काम भी करते हैं। 


संजय जी, आपने बहुत कम वक्त में बहुत कुछ हासिल किया। आजकल की जो युवा पीढी़ है, जिनके पास पहले से बहुत कुछ है वो उसी को  नहीं सम्हाल पा रही है। इस पर आप क्या कहेगें ?
देखिये हमारे पास शुरुआत में जो कुछ भी था वो था पिता जी का आर्शीवाद और आज भी हम तीनों भाईयों के पास जो भी है पिता जी की ही देन है। भाईयों में सबसे छोटा होने के नाते बिगड़ने के सबसे ज्यादा चांस मेरे ही थे। लेकिन यकीन मानीये मुझ पर ईश्वर की अनुकम्पा रही, और बड़ों का आर्शीवाद मिला है इसी कारण आज हम लोग यहां पहुंचे हैं और रही बात युवा पीढी की तो मैं किसी पर टिप्पणी नहीं कर सकता हूँ। अपने बारे में कह सकता हूँ। 

युवाओं के लिए आप एक प्रेरणास्त्रोत हैं। कैसा महसूस करते हैं ? 
आज का युवा अगर चाहे तो किसी से भी प्रेरणा लेे सकता है। आज हम पत्थर की मूर्ति को पूजते हैं क्योंकि उसमे हमें भगवान दिखते हैं। आप अगर लेना चाहे तो प्रेरणा उनसे ले सकते है। तो हम लोग तो इंसान है। 

पत्रकारिता की भाषा में कहें तो आज शिक्षा का व्यवसायिकरण हो चुका है। क्या कहेगें इस पर आप और किस तरह के सुधार की आवश्यकता है ? 
देखिये आज कोई एक ऐसा क्षेत्र बताइये जिसका व्यवसायिकरण नहीं हुआ हो। राजनीति का व्यवसायिकरण हो गया है, सिविल सेवा का व्यवसायिकरण हो चुका है, यहँा तक कहें तो हर चीज का व्यवसायिक प्रारुप सामने है। जो इसको ग्रहण करना चाहता है ग्रहण कर लेता है, जो नहीं  चाहता है वो नहीं करता है। हर एक चीज का एक शाॅर्टकट होता है और एक लाँगकट। किसी को सही रास्ता पसंद आता है तो किसी को गलत। जिसको जो चुनना है वह स्वतंत्र है। 

हमारे माध्यम से युवाओं के लिए कोई संदेश देना चाहेंगे ?
सपने देखों और खूब मेहनत करों सपने जरूर पूरे होतेे हैं।

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