समाज का अभिन्न अंग है मंगलमुखी-श्री समीर वर्मा

Posted by: राधिका प्रकाश Monday 14th of November 2016 05:28:46 PM

जिला अम्बेडकर नगर में जन्म और वहीं प्रारम्भिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद कानपुर के सीएसजेएमयू से स्नातक और परास्नातक की डिग्री ग्रहण करने के बाद पीसीएस में चयनित श्री समीर वर्मा आज कानपुर के अपर जिला अधिकारी ;भू एवं अध्याप्तिद्ध के पद पर तैनात हैं। फैजाबाद में ट्रेनिंग के बाद उत्तराखंड, वाराणसी, रायबरेली, कानपुर देहात, मथुरा, देवरियां जैसे जिलों में आप ने अभी तक आपने अपनी सेवाएं दी। कानपुर नगर में आगमी विधानसभा चुनावों को देखते हुए हमारे एडिटर-इन-चीफ डा. प्रदीप तिवारी जी ने आपसे बातचीत की जिसके प्रस्तुत हैं प्रमुख अंश-

सर आप कहाँ के निवासी हैं और आपने प्रारम्भिक शिक्षा कहां हुयी?
मै रहने वाला अम्बेडकर नगर का हूँ जो कि पहले फैजाबाद का हिस्सा हुआ करता था। प्रारम्भिक शिक्षा मेरी वहीं की हैं। इण्टरमीडिएट तक मैने वहीं पर पढ़ाई की हुयी हैं। बाद मे मैने परास्नातक तक कानपुर में पढ़ाई की।

प्रशासनिक सेवा में आने की प्रेरणा कहां से मिली?
मै मध्यम वर्गीय से हूँ। हमारे बीच की जो समस्याएं होती हैं हम लोगों के परिवार में भी ऐसी दिक्कते आती थी जैसे दूसरों के परिवारों में तो ऐसा लगा कि अपने भी घर में कोई हो या काश मैं ही अगर होता तो लोगों की समस्याएं सुनकर उनका निवारण कर सकू। तभी मैने इस सर्विस के बारे में जानकारी इक्टठा की कैसे इसमें प्रवेश या सेलेक्शन लिया जा सकता हैं। और इस परीक्षा को पास करने के लिए मैने इसकी तैयारी लखनऊ से की।

सबसे पहले आपकी ज्वाइनिंग कहाँ और किस विभाग में हुयी।
हमारा मूल विभाग राजस्व विभाग हैं। हम लोग शासन के प्रतिनिधि के रूप में काम करते हैं। पहली ज्वाइनिंग ट्रेनिंग के रूप में फैजाबाद मे हुयी। फिर उत्तराखंड, नैनीताल, अलमोड़ा, जैसे जिलों में और वापस उत्तर प्रदेश आने के बाद में वाराणसी, रायबरेली, कानपुर नगर, देहात, मथुरा, देवरिया जैसे जिलों में काम करने एवं अपनी सेवा देने का मौका मिला।

आपने बहुत जगह काम किया और वर्तमान में कानपुर में हैं एडीएम भू एवं अध्याप्ति के पद पर हैं, कानपुर से आपका जुड़ाव भी रहा है। यहाँ की समस्याओं को आप जानते भी होगें। तब से अब में आप ने क्या सुधार पाया या अभी लगता हैं कुछ और सुधार या कुछ नया होना चाहिए।
कानपुर वास्तव में मेरे लिए नया नहीं हैं। एक छात्र के रूप में मेरा जीवन भी यहाँ गुजरा हैं। मेरा परिवार भी यहां पर हैं और पहले भी मैं यहां पोस्टेड रह चुका हूँ। यहां पर मै एसडीएम घाटमपुर और एसीएम पाँच के रूप में रह चुका हूँ। अब लौटा हूँ तो मेरा विभाग बदला हुआ हैं। अब मैं एडीएम भू एवं अध्याप्ति के रूप में कार्य कर रहा हूँ।
भारत सरकार और  राज्य सरकार की बहुत सारी परियोजनाएं हैं जिसमें कार्यवाही की जाती हैं। उसे मैं देख रहा हूँ। मैने यह देखा हैं कि कुछ सालों में लोगों में जागरूकता बढ़ी हैं। खास तौर से राष्ट्रीय स्तर के अभियान जैसे स्वच्छ भारत अभियान चालू हुआ हैं तो उसको लेकर के लोगों में संवेदनशीलता बढ़ी हैं। लेकिन फिर भी मुझे कभी-कभी थोड़ी सी निराशा होती हैं। जो आज कल का पढ़ा लिखा ऐलिड वर्ग हैं उन्हे अपने दायित्वों के बारे में पता हैं लेकिन उसके बावजूद वह उसको निभाते नहीं हैं। शासन के द्वारा सेवाओं की डिलेवरी करने की भी एक सीमा हैं। मैं यह चाहता हूँ और उम्मीद हैं कि लोग जिनकों अपने दायित्वों के बारे में पता हैं अगर वो उसको पूरा करने लगें। तो उनकी निर्भरता और शिकायत भी शासन से कम हो जायेगी। 

पहले जिला प्रशासन के अधिकारियों के पास पहुंचने से लोग डरते थे। इसमें अब कमी आयी हैं। अब लोग सीधे डीएम और एसएसपी से मिलने जाते हैं। जबकि पहले लोग थाने जाने में भी डरते थे। यह जो बदलाव आया हैं इसे आप किस नजरिये से देखते हैं।
ये जो बदलाव है वह स्वागत करने योग्य हैं। किसी भी अधिकारी के दफ्तर में मिलने वाले लोग न आये और अपनी समस्याएं भी न लाये। इसका मतलब मैं उस अधिकारी को बड़ा अभागा समझता हूँ। और यह नजरिए से भी लोगों का उसमें विश्वास नहीं हैं। जिस चीज के लिए उसको कुर्सी पर बैठाया गया हैं। वो उसको नही निभा पा रहा हैं। हालांकि बहुत सी ऐसी छोटी चीजे हैं जिससे मुझे लगता हैं कि समाज में आपस में लोगों में सवंाद की कमी हुई हैं। इसके कारण मामूली समस्याओं को लेकर लोग थाने कोर्ट कचहरी या अधिकारियों के पास जाते हैं। मेरा मानना हैं कि आज के समय में बिना जनता की शिकायत सुने और उसका निवारण किये बिना जिला प्रशासन सफल नहीं हो सकता।

कानपुर एक संवेदनशील शहर हैं। इसमें जिला प्रशासन की भूमिका अहम होती हैं। आप का क्या मानना हैं कि इसमें अभी कुछ बदलाव किये जाने हैं।
कानपुर एक बहुत ही संवेदनशील शहर हैं। बिल्कुल नाजुक हालात भी हो जाते हैं। एक बार अगर ऐसी सम्प्रदायिक घटना होती हैं तो शहर दसियों साल पीछे चला जाता हैं। और उसे उभरने में काफी समय लगता हैं। मैं पहले यहां रहा हूँ। यहां के लॉ एंड आर्डर को मैने नजदीक से देखा हैं। अभी लॉ एंड आर्डर में भी मेरी ड्यूटी रही हैं। लोगों में काफी समझदारी बढ़ी हैं। लोग उस चीज को दोहराना नहीं चाहते। लेकिन फिर भी कानपुर काफी समय से इस चीज की चर्चा में रहा है कि यहां पर अलग-अलग प्रकार के कुछ राष्ट्र विरोधी लोग भी रहते हैं। उन्होने अपना वेश बना रखा हैं। वह अपनी विचार धाराओं को फेलाने की कोशिश करते हैं। ऐजन्सी भी उनमें लगातार काम करती रहती हैं। कानपुर एक बड़ी व्यापारिक शहर भी हैं। सम्प्रदायिक रूप से संवेदनशील भी हैं। इसलिये लगातार निगाह रखने की भी जरूरत हैं। और पब्लिक को भी सतर्क रहने की जरूरत हैं कि अगर कही भी संदिग्ध दिखायी दे तो प्रशासन या पुलिस को इसकी फौरन सूचना दे।

चुनाव को लेकर प्रशासन पर एक बड़ी जिम्मेदारी आ रही हैं। मतदाता निकले भी और मतदान अच्छी तरह से हो जाये। इसके लिए अभी क्या तैयारियां की गयी हैं। जिससे लोग जागरूक हो और आपका संदेष मतदाता के पास तक पहुंचे।
इलेक्शन एक टीम वर्क के रूप में होता हैं और सभी लोग उसके जिला निर्वाचन अधिकारी के निर्देशन में काम करते हैं। चुनाव आयोग की अब इस प्रकार की व्यवस्था हो गयी हैं। कि पहले कि तरह चुनाव बाहूबल के आधार पर जीते नहीं जा सकते हैं। और अगर कोई इस भ्रम में हैं कि वह बूथ कैप्चर कर लेगें तो हम जीत जायेगें। ऐसी जानकारी होने पर पूरे जिले की फोर्स वहां पहुंच कर उसकी रिपोलिंग करवाती हैं। अब चुनाव का सिस्टम बहुत साइंटिफ हो गया है और एक-एक मतदाता तक हम पहुंचना चाहते हैं। साथ ही उनकी जानकारी भी हम लेना चाहते हैं। यह बात सही है कि हमारी जो मतदाता सूची हैं उसमें जितना प्रतिनिधित्व युवाओं का होना चाहिए था वह नही हैं। समाज के अन्य वर्गो का जो होना चाहिए था वह भी नहीं हैं। किन्नर (थर्ड जेंडर) को मै सिर्फ वोटर के रूप में नही देखता हूँ। वे समाज के एक अटूट हिस्सा हैं। मैं नहीं चाहता हूं कि समाज का नजरिया उनके लिए एक उपहास पूर्ण हो। या लोग उन्हे विचित्र नजरीये से देखें। उनको भी उसी तरह के सारे अधिकार मिलने चाहिए। जैसे हम सभी को मिलते हैं। इन लोगों को भी दुकानों, माल्स, सरकारी सेवाओं में और घरो में नौकरी मिलनी चाहिए । इन लोगों के पास रोजगार और जीविका के विकल्प भी कम होते हैं। मतदाता बनने का चरण हैं हम चाहते है कि ये लोग स्वाभिमान के साथ आये और अपना नाम वोटर लिस्ट में दर्ज करायें। ये देखना सुखद होगा कि जिस दिन हमारे यहां मतदान होता हैं उस दिन हमारे मतदाता की लाइन में थर्ड जेंडर भी खड़ा हो अपने मताधिकार का प्रयोग करें। यह मुझे तब जानकारी हुई जब मै मतदाता सूची के आकड़ो का अवलोकन कर रहा था। मुझे थोड़ा आश्चर्य हुआ कि हमारे शहर में केवल 172 थर्ड जेंडर मतदाता हैं। जबकि सुप्रीम कोर्ट ने इनके अधिकारों पर मोहर लगा दी हैं। संविधान ने तो पहले से ही आर्टिकल 14,15,21 के माध्यम से यह कह रखा हैं। तो कोई कारण ही नहीं हैं कि उनको पीछे छोड़ दे और उनको पीछे छोड़ के कोई भी देश प्रगति नहीं कर सकता हैं 

आपने इनकी जो रूपरेखा तैयार की है। इसमें ये घर-घर जाकर लोगों को जागरूक करेगें इसमें प्रशासन इनको कैसे सहयोग करेगा।
देखिये इसमे अभी हमारा मतदाता जागरूकता का अभियान चल रहा है। 31 अक्टूबर तक इस बात तक सीमित हैं कि हम लोगों को वोटर बनाएं। एक बार वे वोटर बन जायेगें तब हमारा दूसरा चरण शुरू होगा। जिसमें हम अपील करेगें कि वो वोट डाले। पहले चरण में हम प्रयास करेगें कि जो लोग अभी तक मतदाता नहीं बने हैं। खास तौर पर 18-19 वर्ष के युवक-युवतियां। वह पहले वोटर बने और वोटर बनने के बाद अगला चरण शुरू होगा। जिसमें हम सभी से अपील करेगें कि जब भी हमारे मतदान की तिथि चुनाव आयोग तय करेगा उस तिथि पर हम घर से निकले और अपने मताधिकार का प्रयोग करें। तो हम आगें इसमें थर्ड जेंडर (किन्नरों) को बड़े पैमाने पर उपयोग करने वाले हैं। उसका सबसे बड़ा यह कारण होगा कि हमारे अपनी टीम की अपेक्षा में इनकी पहुंच घर-घर तक हैं। ये सभी को जानते हैं इनकी बातों का असर भी होता हैं। और मुझे कोई कारण नही लगता कि अगर ये लोगों से एक अच्छे काम की अपील करेगें तो समाज के एक प्रगतिशील वर्ग में भी चैतन्यता जागेगी। जब यह निकल कर ऐसा काम कर सकते है तो हम क्यों नहीं कर सकते हैं।


हमारी पत्रिका के माध्यम से आप लोगों तक क्या अपील देना चाहेंगे?
अभी 2017 में हमारा चुनाव होना हैं। पांच साल में एक बार हमें मौका मिलता हैं। लोग हमारे दरवाजे पर आते हैं हमारा हाल-चाल पूछते हैं और हमारे बारे में पूछते हैं। लेकिन यह तभी होगा जब हम एक मतदाता के रूप में पंजीकृत होंगे। अगर आप मतदाता नहीं हैं तो उनके लिए आपका कोई महत्तव नहीं हैं। एक नागरिक के रूप में संविधान के द्वारा जो ताकत मिली हैं। जो अधिकार संविधान के द्वारा आपको मिले हैं। उसका उपयोग करने का यह सही और अच्छा तरीका हैं। जब हम अधिकारी की बात करते हैं तो हमारे कर्तव्य भी सबसे पहले आने चाहिए और पहला हमारा कर्तव्य हैं कि मतदाता के रूप में अपने आप को पंजीकृत करें और अपने मताधिकार का उपयोग करें।


पब्लिक आक्रोश के लिए कोई संदेष?
मैं आपकी पत्रिका को शुभकामनाएं देता हूँ और उम्मीद करता हूँ कि युवाआंे तक इस संदेश को आप आगें लेकर जायेगें। मेरा हर तरह से आपको सहयोग रहेगा। 

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