मानसिक रूप से बंदियों को सुधारना ही जेल का मूल उद्देश्य

Posted by: Publlic Akrosh ADMIN Thursday 8th of September 2016 10:32:49 AM

जिला जौनपुर में जन्म के बाद मऊ में शिक्षा प्राप्त कर इलाहाबाद में खाद्य विभाग के राशनिंग इंस्पेक्टर के पद पर तैनाती के दौरान ही अपने मित्र एवं उनके फादर इन लॅा को पे्ररणास्रोत मानकर जेल अधीक्षक पद की तैयारी कर उसमें सफल रहे श्री विपिन कुमार मिश्र जी आज कानपुर जिला कारागार में जेल अधीक्षक के पद पर तैनात हैं। महाराजगंज में पहली तैनाती के बाद सेन्ट्रल जेल फतेहगढ़ में आपने अब तक अपनी सेवाएं दी हैं। कानपुर जिला कारागार में बंदियों के लिए लगातार कुछ नया कर रहे जेल अधीक्षक से मुलाकात की हमारे एडिटर-इन-चीफ डॉ. प्रदीप तिवारी जी ने प्रस्तुत हैं बातचीत के प्रमुख अंश:-


आप कहां के निवासी हैं और आपकी प्रारम्भिक शिक्षा कहां हुयी?
मैं मूलतः जौनपुर का रहने वाला हूँ पर हमारे पिता जी मऊ में यूनिवर्सिटी में केमिस्ट्री के लेक्चरर थेे। 1988 में जब मैं कक्षा आठ में था तो पिता जी का स्वर्गवास हो गया। उसके बाद हमारे बड़े भाई वहां रहते हैं। बाकी पूरा परिवार जौनपुर में हैं।

आपको इस विभाग में आने की प्रेरणा कहां से मिली आप अपना प्रेरणास्रोत किसे मानते हैं?              

 मैं सबसे पहले खाद्य विभाग राशनिंग इंस्पेक्टर के पद पर था। मेरी इलाहाबाद पोस्टिंग में थी। इसके साथ ही काम्पटीशन की तैयारी भी कर रहा था। जेल अधीक्षक के रूप में हमारे एक मित्र थे और उनके फादर इन लॅा डीआईजी जेल थे तो जेल के बारे में कुछ तथ्य मालूम थे इसलिए मैने इसमें एप्लाई किया क्योकि मुझको लगा जेल से अच्छी कोई और जगह नहीं है। जहां पर आपको हमेशा एक अच्छा करने का अवसर मिलता हैं और दबाव सबसे न्यूनतम रहता हैं।


 जेल अपने आप में जो शब्द हैं वो आदमी को डराता है और फिर इसके आप अधीक्षक हैं और वर्तमान में भी इस पद पर हैं कैसा अनुभव है अभी तक का?
जेल शब्द डराता है लेकिन अब वर्तमान मेें तो जेल को बदल कर सुधार गृह के रूप में शासन और प्रशासन बदलने का काम कर रहा हैं। अभी भी अगर वास्तव में लोगों को किसी चीज का भय हैं तो वह है जेल का जिसकी वजह से कानून व्यवस्था बनी हुयी हैं। लेकिन जेल अधिकारी और जेल कर्मचारी, जेल के हमारे वर्तमान मंत्री महोदय भी हैं जो कि चाहते हैं कि जेल का भय लोगों में कम हो और वो यहां अपना पश्चाताप करें और यहां से सुधर कर मुख्य धारा में वापस जाये और एक अच्छा जीवन व्यतीत करें।


 जेल का मूल उद्देश्य क्या हैं ?
 अदालत जो सजा देती है उसे प्रभावी कराना अथवा बंदी या कैदी जो भी हैं उसे सुधारने का प्रयास करना, धीरे-धीरे जेल का काम बदलता जा रहा हैं। किसी भी आदमी के लिए अब जेल में अब आना ही अपने आप में बहुत बड़ी सजा हो गयी हैं। जेल में वो प्रवेश कर गया किन्ही अपने कारणों से जो अपराध हो गये उनसे या अपराध किया या नही किया अभी डिसाइड होना बाकी हैं हमारे पास वर्तमान समय में है तो अगर हम सुधार नहीं करेगें तो या हमारा प्रयास नहीं होगा यदि उनके अन्दर कोई बदलाव नहीं आता जेल में आके तो फिर वो 2 साल, 4 साल, 6 साल, 10 साल, 15 साल, 20 साल सजा काट के फिर बाहर जा के वहीं काम करते हैं तो फिर जेल का कंसेप्ट खत्म हो जाएगा और ऐसा संभव नहीं की इस समय में की अपराध न हो और सारे अपराधियों को कारावास के अंदर बंद कर दिया जाये फिर वो सजा भुगते और फिर वो कोई गलत काम करे और फिर अंदर आये, तो सुधारना तो हमारी ड्यूटी भी है और हमारी मजबूरी भी।


आपको क्या लगता है आपने इसमें काम किया तो कितने प्रतिशत सुधार आप देखते हैं?
दरअसल ऐसा कोई डाटा हमारे पास नहीं हैं हमारा तो यही प्रयास रहता है कि आदमी जितने भी दिन कारागार के अंदर है हमारी वजह से कोई ऐसा काम न हो हमारे अपने जो स्टाफ है, सहकर्मी है उनके द्वारा कोई ऐसा काम ना हो की उनके यहां का जो समय इतना भारी गुजर जाये की उनके अन्दर परिवर्तन की संभावनाये खत्म हो जाये और उनके अन्दर बदले की भावना आ जाये या वो इतने दुखी हो जाये की बाहर जाकर अपनी एक नार्मल या नयी जिंदगी शुरू करने मं कोई परेशानी आये।


जेल पर अक्सर आरोप लगते हैं कि जेल में अपराधियों का बोल बाला हो जाता है इसके संबध में आप क्या कहेगें?
सामान्यता ऐसा कही होता नही है की अपराधियों को बोल बाला रहता हो चूंकि समाज है और समाज का अपना एक पार्ट जेल भी हैं। और जेल में भी एक समाज है और जेल में भी एक बहुत बड़ा परिवार है और सारे लोग एक जैसे जी भी नही पाते। कहीं पर भी अगर एक परिवार में चार लोग रहते है तो चारो न तो एक जैसी भूमिका निभा पाते हैं और न तो एक जैसे रह पाते हैं। अपने स्तर से जेल अधिकारी सबके साथ सामान्य व्यवहार करने का प्रयास करते हैं लेकिन कानून तोडने वाले ही जेल में रहते हैं। हमारा काम हैं उनको सुधारना लेकिन सुधारने के क्रम में ऐसा नहीं होता की जेल के अंदर घूसते ही सभी जेल के कानून का पालन करने लगेगें या अच्छा जीवन व्यतीत करने लगेगें। हमारे पास ऐसा कोई टूल भी नही हैं की उनका कुछ कर दिया जाए। जिससे वे सही हो सके। ये सुधार धीरे-धीरे ही देखने को मिलता हैं। एक दम से यह संभव भी नहीं हैं।


एक बड़ी बात जो बाहर सुनने को मिलती हैं कि जेल में दो कलचर डेवलप हो गये हैं एक वीआईपी और दूसरा सामान्य। वीआईपी कलचर में कौन आता हैं नेता या बड़ा आदमी या बड़ा अपराधी ?
इस संबध में मै यही कह सकता हूं कि आप लोग समय-समय पर होने वाले कार्यक्रमों में आये और जेल के अंदर घूमकर देखे स्वयं मालूम हो जाएगा। जेल भी धीरे-धीरे समाज के लिये खुल रही है अब लोग अंदर देख रहे है कि अंदर क्या होता हैं जब तक चीजे परदे के अंदर है तब तक लगता हैं कि अंदर कोई वीआईपी कलचर हैं। न तो यहां किसी को बेड मिलता हैं न तो किसी को सोफा। लेकिन बाहर से लोग आसानी से आरोप लगा देते हैं। यहां पर अपने स्तर से कोई भी दोहरा व्यवहार नहीं किया जाता हैं। रही बात आदमी की जब तब वह अंडर ट्रायल है तब तक उसकी क्षमता के अनुसार उसको कुछ सुविधाए दी गयी है जैसे अपने से अच्छा कपड़ा पहनने की। जिसके पास नहीं हैं अच्छा पहनने के लिए तो वहीं से दोनों में अन्तर दिखने लगता हैं। अन्दर सभी को कैंटीन की सुविधा दी गयी हैं। जिसका कुछ लोग उपभोग भी करते हैं तो वीआईपी दिखने लगते हैं। कुछ लोग हमारी जेल के खाने पर निर्भर रहते है तो वो वीआईपी नहीं दिखते हैं अपनी तरफ से ऐसा कोई प्रयास नहीं रहता है कि दो सुविधा दी जाये। क्योकि कहीं दो हजार कहीं ढ़ाई हजार तो कही छः सौ बंदी भी है अगर जेल प्रशासन ऐसा करे तो उनका भी जीना मुश्किल हो जाएगा। आज जनता के साथ-साथ बंदी भाई-बहनें भी जागरूक हो गये हैं और उनकी सहायता करने वाले भी उतने ही सक्षम हैं। तो ये आरोप लगाने आसान हैं कही-कही किसी को दिक्कत आती होगी तो बाहर निकलने के बाद या ऐसे ही अनबन ढ़ंग से आरोप लगा देते हैं। अन्यथा मेरी समझ में कोई वीआईपी कल्चर अपनी जेल तो क्या किसी भी जेल में नहीं हैं। चूंकि लोगों ने अन्दर आकर देखा नहीं है इसलिए आसानी से आरोप लगा देते हैं।


जेल की क्षमताएं कम होती जा रही हैं। इससे आप लोग कैदीयो व बंदियों को किस प्रकार की समस्या का सामना करना पड़ रहा हैं। इसके लिए प्रशासन क्या कदम उठा रहा हैं ?
इस समस्या के बारे में तो जिला प्रशासन, राज्य सरकार, ह्यूमयन राइट, सुप्रीम कोर्ट तक के लोगों को जानकारी हैं। सभी को लगता हैं कि ओवर क्राउडिंग जेल की लगभग सारी समस्याओं की जड़ में है क्योंकि ओवर क्राउडिंग से व्यक्ति की मनोदशा एवं सफाई पर प्रभाव पड़ता हैं। आदमी के सही रख-रखाव न होने से तमाम तरह की बीमारियां फैलने का खतरा रहता हैं इसे तमाम दबाव जो हमारे जेल अधिकारियों और कर्मचारियों पर पड़ता हैं। इसके लिएशासन ने नयी जेल निर्माण के लिए जमीन भी देख ली हैं और जमीन की खरीद भी शुरू हो गयी हैं। चूंकि समाज में अपराध बढ़ते जा रहे हैं। एक यह भी बड़ा कारण हैं जेल में बंदियों के बढने का।


मुकदमों में जो देरी हो रही हैं उसका भी असर इसमें पड़ता हैं क्या?
निश्चित तौर पर जो मुकदमों में देरी होती हैं उससे क्राउड तो बढ़ता ही हैं। हम तो किसी भी घटना के साक्षी भी नहीं होते है तो फिर भी लोगों को लगता हैं कि हम लोग अपराध के साक्षी हैं जबकि ऐसा नही है। मुकदमें के  लम्बे समय तक खिचने से बंदी मानसिक रूप से अवसाद ग्रस्त होते हैं जिसका खामियाजा हम लोग भी भुगतते हैं और साथ में रहने वाले बंदी भी भुगतते हैं।


कानपुर जेल की बात करे तो इसमें हर प्रकार के बंदी हैं इनके सुधार के लिए आप क्या कुछ नया कर रहे हैं ?
जेल में हमेशा से काफी पिछले दशक से सुधार के कार्यक्रम हो रहे है, सुधार के  कार्यक्रम इसीलिये हो रहे है कि जो बंदी अवसाद में रहते है या किसी अन्य करणों से केस में देरी हो रही हैं जो अपना समय वेस्ट कर रहे हैं या सजा भुगत रहे हैं। उनके लिए प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना के तहत ट्रेनिंग दी जा रही हैं। अभी हाल ही में हमारे यहां इलेक्ट्रीशियन, प्लमबरिंग की ट्रेनिंग बंदियों को दी गयी। महिला बंदियों का ब्यूटीशियन कोर्स वर्तमान समय में चल रहा हैं। इसके अलावा तमाम संस्थाये जैसे प्रजापति ब्रह्मकुमारी, राजयोग संस्थान, चर्च के फादर अन्य लोग आकर बंदियों को मोटिवेट करने का काम करते हैं। जिससे वह अपना समय अच्छे से काट ले और जो अपराध हुआ हैं उसका पश्चाताप करे और यदि नहीं भी हुआ है तो इंतजार करे कोर्ट से उन्हे न्याय जरूर मिलेगा और बाहर जाकर वह अच्छी जिंदगी व्यतीत कर सके।

इसके पहले आपकी तैनाती कहां रही ?
इसके पहले मेरी तैनाती सेन्ट्रल जेल फतेहगढ़ में रही उससे पहले महाराजगंज में मेरी तैनाती रहीं।

साक्षात्कार के अंत में श्री विपिन कुमार मिश्रा जी ने पब्लिक आक्रोश को बधाई देते हुए कहा कि आप का काम सराहनीय है और मैं उम्मीद करता हूॅ कि पब्लिक आक्रोश ऊचांईयों को छुए।

 

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