बंदूक कें दम पर नही विचारधाराओं से जीती जाती है जंग

Posted by: राधिका प्रकाश Friday 30th of September 2016 10:03:59 AM

आज आपको तमाम न्यूज़ चैनल्स 24 धण्टे सातों दिन वर्षों से चलते नज़र आ रहे होगें और दिन पर दिन उनकी नंबर वन बनेने की होड़ भी जगजहिर है। पर उसी भीड़ में से अलग चैनल समाचार प्लस ने मात्र 2 वर्षों में उ0 प्र0 व उत्तराखण्ड में जो अपनी अलग पहचान बनायी है, उसमें चैनल के मैनेजिंग एडिटर अमिताभ अग्निहोत्री जी के अति महत्वपूर्ण योगदान को हम कभी नकार नही सकते। अपनी निडर, निर्भीक व बेबाक टिप्पणीयों से राजनीति के सूरमाओं से लेकर प्रशासन के आलाकमानों की बोलती बंद कर देने वाले अमिताभ जी का नाम और काम आज देश के हर घर में लोकप्रिय हो चुका है। देश की आवाम की आवाज को अपने मंच से बुलंद करने का एकमात्र मकसद लिये फर्रूखाबाद से दिल्ली के सफर में अपने 25 वर्षों के पत्रकारिता के अनुभव को अमिताभ जी ने एक खास मुलाकात में साझा किया हमारे चीफ एडिटर डा0 प्रदीप तिवारी जी से। प्रस्तुत है उनकी बातचीत के प्रमुख अंश-हमारे एडिटर इन चीफ डॉ. प्रदीप तिवारी से बातचीत के कुछ अंश

आप अपनी पारिवारिक पृष्ठ भूमि के विषय में बताइये?

हमारे परदादा अर्जुन जी से शुरूआत करते हैं। हमारे परदादा जी के तीन लडके थे। किशन सिंह, स्वर्ण सिंह, अजीत सिंह। जिसमें सरदार स्वर्ण सिंह व सरदार अजीत सिंह की कोई संतान नही थी। सबसे बड़े थे किशन सिंह जी थे जिनके छरू पुत्र, तीन पुत्रियां थी। सबसे बड़े जगत सिंह, भगत सिंह, कुलवीर सिंह, कुलतार सिंह, रनवीर सिंह, राजेन्द्र सिंह, बहनें बेबी अमर कौर, प्रकाश कौर और शकुन्तला देवी। हमारे पिताजी स. कुलवीर सिंह जी थे। शहीदे-आजम की फॉसी के बाद  पिताजी कुलवीर सिंह जी ने उनके मिशन को आगें बढ़ाया और आठ साल के करीब जेल काटी। आजादी के आन्दोलन की अलग-अलग गतिविधियों में सक्रिय रहें। चाचा कुलतार सिंह भी उनके साथ जेल में रहे। शहीदे-आजम भगत सिंह की बहन बेबी अमर कौर ने भी आन्दोलन के आखिरी के दिनों में जेल काटी। पूरा परिवार देश की आजादी के लिए लगा रहा।

आपका पैतृक गॉव कहॉ है और नयी पीढ़ी आज कहां रह रही हैं?
हमारा पुश्तैनी गॉव खटखड़ कला जालंधर अब जिला शहीद भगत सिंह नगर से जालंधर अब जिला शहीद भगत सिंह नगर से लायलपुर जिले अब पाकिस्तान मेें फैजलाबाद जिला में जा बसे थे। स. अर्जुन सिंह समाज सुधारों के पक्के पैरोकार थे। उन्होने स्वतन्त्रता की जंग में ईस्ट इंडिया कम्पनी की ओर से खुली जमीन देने की पेशकश को ठुकरा दिया था। स. भगत सिंह जी का जन्म पाकिस्तान में जो चक १०५ था। जिसको बंगा भी बोलते हैं उसमें उनका जन्म हुआ था। इनकी प्रारम्भिक शिक्षा गॉव में ही हुयी। इसके बाद लाहौर के डी.ए.वी कालेज में आपकी आगें की पढ़ाई हुई। पूरा परिवार देश के बंटवारे के बाद पंजाब आया। परिवार देश के बटंवारे के बाद भारत आया। जिसके बाद से परिवार अलग-अलग हो गया। पिताजी और चाचाजी सहारनपुर में रहने लगे और नैनीताल में रहने लगे।

आपके परिवार में कौन-कौन हैं  आप इस समय कहॉ रह रहे हैं?

मेरी एक बेटी व एक बेटा हैं जिसकी उम्र २६ साल हैं। गे्रजुएशन के बाद वह समाजिक कार्य में लगा हुआ हैं। ( हमें बताते हुए बड़ा दुख हो रहा हैं कि इस इंटरव्यू के प्रकाशित होने से कुछ दिनों पहले आपके बेटे की सडकी हादसे में मौत हो गयी।) आप इस समय चंडीगढ़ में परिवार के साथ रह रहे हैं। 

शहीदे आजम भगत सिंह के परिवार को पंजाब सरकार की ओर से या भारत सरकार की ओर से क्या विशेष सुविधायें दी मुहैया कराई गयी?

सरकार की ओर से ऐसी कोई विशेष सुविधा नहीं मिली हुई हैं। और न ही हम इसकी अपेक्षा करते हैं। हमारे पूरे परिवार ने स्वतन्त्रता आन्दोलन में बढ़-चढ़ा कर हिस्सा लिया। ये हमारा कर्तव्य था।

अभी तक शहीद-ए-आजम भगत सिंह को शहीद का दर्जा सरकार की ओर से नहीं दिया गया हैं। आप क्या कहेगें?

शहीद का दर्जा पाने के लिये उन्हे किसी के प्रमाण की जरूरत नहीं हैं। लोगों की भावनाओं मेें वह शहीद हैं। जिस दिन इनकोंफॉसी दी गयी थी। बहुत सारी जगहों पर चुल्हा नहीं जला था। हजारों लोग उनके अन्तिम संस्कार में शामिल हुये थे। यह लोगों को उनके प्रति भावना थी। शहीद-ए-आजम लोगों ने उनकी सोच की वजह से यह उपाधि दी। उनकी सोंच संर्कीण नहीं थी। इतनी कम उम्र में इस तरह से लोगों का उनके प्रति प्यार उनकी सोंच का ही नतीजा था।

कानपुर से शहीद-ए-आजम का जुड़ाव रहा, आज आप पहली बार कानपुर यहां आये कोई विशेष जानकारी यदि आप देना चाहे?

परिवार में शादी के दवाब को टालने के लिए शहीद-ए-आजम सोलह साल की उम्र में घर से कानपुर को निकल गये थे। कानपुर में भी वह यू.पी व बिहार के क्रन्तिकारियों को मिले थे। कानपुर में उन्हे पत्रिकारिता सीखने व विश्व राजनीति के बारे में जानने एवं अन्य मुद्दों पर सोचने का अवसर श्री गणेश शंकर विद्यार्थी की अगवायी में मिला। यहीं पर उन्होने आयरलैण्ड के महान संग्रामी योद्धा डॉन ग्रीन के जीवन का अनुवाद किया। उन्होने प्रताप प्रेस में ढ़ाई वर्ष छद्दम वेश में पत्रिकारिता की। 

पिताजी से अपने बचपन के दौरान हुई बात-चीत जिसे आप शेयर करना चाहते हैं?

यह जो सारी जानकारी हैं यह सब पिताजी के द्वारा ही बतायी गयी हैं। क्योकि पिताजी ही शहीद-ए-आजम के काफी निकट थे। पिताजी जेल में उन्हे यदि कोई किताब भेजनी होती थी। यदि कोई नोट लिखकर भेजने हैं यह सारा काम पिताजी के द्वारा किया जाता था। भगत सिंह ने अन्तिम डेढ़ वर्ष जेल के दौरान सौ से ज्यादा किताबे पढ़ी। जो आज भी चंड़ीगढ़ में लाजपत राय लाइब्रेरी में मौजूद हैं।

आप आज के युवाओं को क्या संदेश देना चाहते हैं?

आज के युवाओं को शहीद-ए-आजम की विचार धाराओं का पालन करना चाहिए। बन्दूक से कोई क्रान्ति नहीं आती हैं। क्रान्ति विचार धाराओं से ही आती हैं। यदि आपके पास विचार हैं तो आप सुझाव व उपाय निकाल सकते हैं।

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