पत्रकार के लिए एक मिशन हो पत्रकारिता - प्रवीन साहनी एक्जीक्यूटिव एडिटर, समाचार प्लस, न्यूज़ चैनल

Posted by: Publlic Akrosh ADMIN Wednesday 3rd of June 2015 12:32:59 PM


इलेक्ट्रानिक मीडिया में लगातार बढ़ती प्रतिस्पर्धा के चलते समाचार चैनलों की बढ़ती भीड़ में मात्र दो साल पहले आये एक चैनल ‘समाचार प्लस’ ने खबरों और अपने कुछ चुनिन्दा कार्यक्रमों के दम पर चैनल को इतने कम समय में नंबर वन बना दिया। चैनल को नंबर वन तक पहँुचाने में जिन कार्यक्रमों की मुख्य भूमिका रही उनमें से एक कार्यक्रम है ‘वांटेड’। चैनल के एक्जि़क्यूटिव एडिटर प्रवीन साहनी ने ‘वांटेड’ के माध्यम से उत्तर प्रदेश और आस-पास के अपराधियों को सलाखों के पीछे पहँुचाने का जिम्मा खुद लिया। गाजियाबाद के निवासी श्री साहनी ने पत्रकारिता के जुनून के चलते इंजीनियरिंग के बाद माॅस कम्यूनिकेशन का कोर्स किया और शुरू किया अपनी निडर पत्रकारिता का सफर। क्राइम रिपोर्टर से एक्जि़क्यूटिव एडिटर तक पहँुचे श्री साहनी ने ‘वांटेड’ से अपनी अलग पहचान बनायी।  पत्रकारिता को मिशन बनाकर काम करने वाले प्रवीन साहनी का एक कार्यक्रम के दौरान कानपुर आना हुआ जिसमें उनकी मुलाकात हुई हमारे चीफ एडिटर डा0 प्रदीप तिवारी जी से। प्रस्तुत है उस खास मुलाकात के कुछ प्रमुख अंश-
आपकी प्रारम्भिक शिक्षा कहाँ पर हुई और आप कहाँ के मूल निवासी हैं ?
मैं गाजियाबाद का मूल निवासी हँू और मेरी प्रारम्भिक शिक्षा भी यहीं पर हुई।
आपका एज्यूकेशनल बैकग्राउण्ड क्या रहा और आप कितने वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में है ?
मैंने बी.टेक किया हुआ है और मैं पत्रकारिता के क्षेत्र में करीब 10 वर्षों से हँू। 
इंजीनियरिंग से पत्रकारिता के सफर के बारे में बतायें ? और इस क्षेत्र में कौन है आपका प्रेरणास्त्रोत ?
मैने बी,टेक किया हुआ है और पत्रकारिता की बात करें तो मैं उमेश जी (जो मेरे रिलेटिव भी हैं) से काॅफी प्रेरित हँू। उन्ही को देखकर मुझे इस क्षेत्र में आने की इच्छा हुई तो मैने पत्रकारिता का कोर्स किया। जिसे पूरा करने के बाद मैनें एन.एन.आई (न्यूज पोर्टल) में रिपोर्टर फिर यू.पी.वेस्ट इचांर्ज और फिर संपादक तक का सफर तय किया।

‘वांटेड’ के बारे में कहाँ से विचार आया ?
शुरुआत में मैनें कई एक वेबसाइट चालायी जैसे भड़ास फाॅर पुलिस, एन.एन.आई आदि। मुझे शुरू से ही क्राइम की खबरों को लेकर खास रूचि रहती थी। ’वांटेड’ का कानॅसेप्ट काॅफी समय से मेरे दिमाग में था। कई अपराधियों पर तो मैने रिसर्च भी कर रखी थी। उनके बारें में काॅफी कुछ जानकारी हासिल कर रखी थी मैनें, जैसे उनका रहन-सहन, उनके अपराध करने का स्टाईल और भी बहुत कुछ। हाँ कभी-कभी डर लगता था, पर अपराध पर अकुंश लगाने की इस पहल के जुनून ने डर को पीछे छोड़ दिया और मैनें अतंतः समाचार प्लस पर ‘वांटेड’ को शुरू किया।

इनामी अपराधियों को पकड़वाने का बीड़ा जो आपने उठाया है, उसमें आपको किस हद तक सफलता मिली ?
इसमें मुझे काॅफी हद तक सफलता मिली है जैसे शो में दिखायी गयी कहानियों में से अमित भूरा, मोनू पहाड़ी, जोगेन्द्र सिंह जुगला, सुरेन्द्र सिंह उर्फ धारा को पुलिस पकड़ चुकी है। अब तो कई एक फोन भी आने लगें हैं, कार्यक्रम को लेकर। अभी हाल ही में एक पुराने मित्र का फोन आया कि आपको और आपके इस कार्यक्रम की चर्चा पुलिस के आला अधिकारियों से लेकर जेल तक है, तो अच्छा लगता है, यह सुनकर कि जो कार्य कर रहा हँू वो सराहा जा रहा है।

शो के दौरान कभी डर नहीं महसूस किया आपने ?
देखिये, डर तो पहले एपिसोड के शुरू होने तक था। अब तो डर जरा भी नहीं है, और मेरा ये प्रयास है कि इस मुहिम को तब तक जारी रखंू, जब तक उत्तर प्रदेश का हर ‘वांटेड’ अपराधी जेल में न पहँुच जाए।

अपराधियों की कुंडली तैयार करने में पुलिस का कितना सहयोग रहता है ?
पुलिस के सहयोग के बिना तो कार्यक्रम बना पाना संभव नहीं था। बहुत सारी चीजों पर इन्फार्मेशन इकट्ठा करनी पड़ती है। जैसे अपराधी की गतिविधियाँ, अपराध का तरीका, वारदात स्थल, अपराधिक रिकार्ड आदि जिसके लिए आई.ओ से सम्पर्क करना पड़ता है। सूत्रों से लेकर मुखबिरों तक सभी से जानकारियाँ प्राप्त करनी पड़ती है। मैनें इस कार्यक्रम में एक खास बात रखी है, जिसमें हम अपराध करने के तरीके को हाईलाईट करते है, जिसमें उसे मास्टरी है, जैसे देबू है, वो हमेशा पुलिस की वर्दी में ही क्राईम करता है, राहुल खट्टा है वो पुलिस वालों को ही अपना शिकार बनाता है। हम यह दिखाने की कोशिश करते है, कि ये क्या करते हंै, कैसे करते हैं और इनको कैसे पकड़ा जा सकता है। अब तो इतना रिसर्च कर चुका हँू कि अपराध के स्टाईल से हम पता लगा सकते है, कि किसने किया है वो अपराध।

शो को लेकर या फिर किसी विशेष अपराधी को लेकर क्या कभी राजनीतिक दबाव भी पड़ा है ?
नहीं, आज तक तो किसी भी राजनीतिक पार्टी का कोई दबाव नही पड़ा। हाँ अपराधियों को पकड़वाने के लिए जरूर कुछ एक फोन काॅल आ जाते हैं आॅफिस में, जैसे हाल ही में एक अपराधी को किसी ने राजस्थान के कोटा में देखा तो हमें फोन पर सूचित किया, जिसको हमने तुरंत डी.आई.जी मेरठ को बताया और उन्होनंे राजस्थान पुलिस को। अभी भूरा के गिरफ्तार होने से पहले ही एक फोन आया कि वो खुद भूरा बोल रहा है। बलिया का एक अपराधी है कौशल कुमार चैबे जिसने खुद अपने हाथ से 3 पेज का लेटर लिख कर एक फर्जी ई-मेल आई.डी से हमें मेल किया। जिसमें उसने अपनी कहानी बतायी थी। तो इस तरह के फोन काॅल्स या मेल आते रहते हैं।

दाऊद के बारे में क्या कहना है आपका ? क्या भारत सरकार दाऊद को पकड़ पायेगी ?
देखिये अगर इच्छाशक्ति हो तो किसी को भी पकड़ा जा सकता है, वैसे इस वक्त दाऊद को लेकर सिर्फ राजनीति ही हो रही है। चाहे वो मोदी सरकार हो या कांग्रेस की दाऊद को लेकर दोनों ही एक-दूसरे पर सिर्फ आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति करती रहेंगी। अमेरिका के जितने हम ताकतवर तो है नहीं की जाकर दाऊद को उठा लाएं। अभी पाक के उच्चायुक्त आये हुए थे उन्होनें भी सफाई दे दी कि वो मेरे यहाँ है ही नहीं। अब क्या कहेगें आप। मुझे तो लगता है, कि दाऊद भी कशमीर की तरह एक मुद्दा बन जायेगा।

वर्तमान में पत्रकारिता के स्तर को कैसे आंकते हैं ?
अगर देखा जाए तो आज पत्रकारिता 3 हिस्सों में बट चुकी है। पहला जो जिलों में काम कर रहें हैं, दूसरा जो डेस्क पर हैं, और तीसरा संपादकों का। इन सभी में कुछ अच्छे हैं तो कुछ बुरे भी है, सभी प्रकार के लोग हैं। इसमें कोई भी पत्रकार किसी के भी खिलाफ तब तक खबर नहीं बना सकता जब तक उस खबर या व्यक्ति विशेष में तथ्य न हो, सच्चाई न हो। मीडिया अच्छा दिखाती है तो अच्छी बन जाती है और बुरा दिखाती है तो बुरी बन जाती है, लेकिन हम सच ही दिखाते हैं।

पत्रकारिता को कॅरियर बनाने वाले छात्रों के लिए कोई मैसेज देना चाहेंगे ?
हमारे यहाँ हर महीने करीब 50-60 बच्चें आते हैं इंर्टनशिप के लिए, मैं उन सभी बच्चों से खुद बात करता हँू जिसमें ज्यादातर बच्चों की यही सोच देखने को मिलती है कि वो सिर्फ इसलिए पत्रकार या एंकर बनना चाहते हैं कि उनको लोग पहचानने लगें। पुलिस उनकी मुट्ठी में हो। मेरा मानना है कि अगर पत्रकारिता को मिशन बना कर काम करेंगे तो जरूर सफल होंगे।

हमारी पत्रिका के लिए दो शब्द ?
मैं ‘पब्लिक आक्रोश’ के बारे में पहले भी सुन चुका था। आप लोग जिस तरह पत्रिका का प्रचार-प्रसार कर रहे हैं, और जो आपकी मैगज़ीन कर स्तर है, उसे देखकर कोई नहीं कह सकता कि आप इतने कम संसाधनों में भी इस तरह का काम कर रहें हैं। संसाधनों पर बहुत कुछ निर्भर करता है। सीमित संसाधनों में इस तरह की पत्रिका चलाना वाकई काबिल-ए-तारीफ है। आपकी पत्रिका और आपकी टीम के उज्जवल भविष्य की कामना करता हँू।
धन्यवाद...

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