धर्म हमें जोडना व जीना सीखाता हैं - शान्तिदूत देवकी नन्दन ठाकुर

Posted by: राधिका प्रकाश Thursday 15th of December 2016 07:14:10 AM

मूल रूप से ब्रजधाम के निवासी और ब्राहृमण कुल में जन्म लेने के और गुरूकुल में शिक्षा ग्रहण करने के पश्चात गुरूदेव एवं बुजुर्गो द्वारा बताये गये मार्ग पर चलते हुए विश्व में धर्म का प्रचार-प्रसार और शान्ति का संदेश देने वाले शान्तिदूत देवकी नन्दन ठाकुर जी ने केवल भारत में ही नही बल्कि विदेशों में भी अपने धर्म का प्रचार-प्रसार करते हुए शान्ति का संदेश दे रहे हैं। आपसे हमारी पत्रिका के एडिटर-इन-चीफ डॉ प्रदीप कुमार तिवारी जी ने एक मुलाकात कर उनके परिवार और उनसे जुड़ी कई बातों को जाना। प्रस्तुत हैं महाराज जी से हुई बात-चीत के प्रमुख अंश।


शान्तिदूत देवकी नन्दन जी से जानना चाहेगें की महाराज जी आपके परिवारिक दृष्टिकोण के बारे में जानना चाहेगें और आप कहां से हैं?

 मैं बृजधाम से हूँ और जहँा ठाकुर जी ने लीलाएं की हैं। वहाँ हमारा जन्म हुआ और ब्राहृमण कुल में जन्म हुआ भगवान की बड़ी कृपा हुयी और बचपन से ही बालक डाल से ही ये सब धर्म के विषय में हमारे बुजुर्गो के माध्यम ही हमें सीखने को मिलता रहा और आज उन्ही के बताये हुये मार्ग पर चल रहे हैं। गुरूदेव के बताये हुये मार्ग पर चल रहे हैं।

परिवार में आपके कौन-कौन हैं?

परिवार में सभी लोग हैं। माता जी, पिता जी, भाई, बहन और मेरी देवी जी व बच्चे सभी हैं।

महाराज जी आप को कैसे लगा कि विश्व में शान्ति संदेश देना चाहिए?

आज हर एक व्यक्ति अमीर हो या गरीब हो सबको एक ऐसी चीज की चाहत है जिसे सब लोग शान्ति का नाम देते हैं। शान्ति मन का आराम, मन का विश्राम। सब चाहते हैं कि घर बनाने से भी शान्ति नहीं मिलती, बड़ी गाडियों से चलने के बाद भी शान्ति नहीं मिलती, हवाई जहाजों हो या सुख के कोई भी साधन हो लेकिन मानव को शान्ति नहीं मिलती हैं। अब ऐसा क्याहैं जो हमसे बचा हुआ हैं। वो शान्ति हैं परोपकार परमार्थ जब तक आप अपने जीवन में परमार्थ धारण नहीं करेगें। दूसरे धर्म के प्रति सेवा भाव रखना साधु सन्तों की सेवा करना जब तक ये चीजे आप नहीं रखोगें तब तक आपकों शान्ति नहीं मिलेगी तो उसी शान्ति को धर्म में किन-किन नामों से जाना गया हैं। जिसकी वजह से वह शान्ति मिलती हैं। उन सब चीजों का वर्णन करके विश्व शान्ति की चर्चा कर रहे हैं। कुछ लोगों को मिलती भी हैं जो उस मार्ग पर चलते हैं।

आप बहुत जगह कार्यक्रम करते हैं सबसे बड़ी समस्या आपको देखने को क्या मिल रही हैं?

सबसे बड़ी समस्या यह हैं कि आज व्यक्ति अपने आप से दूर भाग रहा हैं। जब वो जानने के बावजूद भी अपने आप से दूर भाग रहा हैं। वो सब जानता भी हैं और उसके बावजूद भी अपने आप से भाग रहा हैं। न उसके बड़े लोग उन्हे समझाना चाहते हैं और न वो खुद समझना चाहता हैं। बस जीवन एक ऐसी दौड़ हैं जिसे लोग दौड़े जा रहे हैं वो भी बिना किसी लक्ष्य के। दरअसल सभी का कोई न कोई लक्ष्य होना चाहिए। लेकिन आज के युवाओं की दौड़ का कोई लक्ष्य ही नहीं हैं। वो आगें भाग रहा हैं तो मैं उसके पीछे। ऐसी जो विषमता की दौड़ हैं या मायावादी जो दौड़ हैं। कितना भी आप पालो आखिर आप के हाथ जिसमें कुछ नहीं लगता हैं। मतलब सब कुछ पाकर भी आप सब कुछ खो देते हैं। ऐसी दौड़ में जो लोग दौड़ रहे हैं। मुझे लगता हैं यह सबसे बड़ी समस्या हैं।

महाराज जी आज के युवा जो दौड़े रहे हैं जैसे-जैसे लोग लिप्त होते जा रहे हैं। इस माया में और विलासिता उससे क्या कुछ ऐसा लगता हैं कि भक्ति की ओर भी उस कारण से ज्यादा लोग बढ़ रहे हैं।

विलासिता में जायेगें तो भक्ति में कहां से आयेगें। जो सत्सगों का प्रभाव हैं, पुराणों का प्रभाव हैं इन्हे जो सुनता हैं और पढ़ता है वो अध्यात्मिकता की ओर बढ़ता हैं। लेकिन जो अन्यत्र भटकते हैं उनको कहीं अन्य व्यवस्थाओं में फंसे रहना पढ़ता हैं और वो भोग विलासताये है क्या ये टीवी, मोबाइल और मूवीज जब से हमारे देश में इनका ज्यादा प्रचलन हुआ हैं तब से हमारे बच्चे और युवा जो हैं दुसरी दिशा में चले गये हैं और कुछ ऐसे लोग भी हैं जो टीवी चैनलों में बैठ गये हैं। जो गलत को ही सही साबित करने में जुटे हुये हैं। सच्चाई से डर लगता हैं वो इसे समझना ही नहीं चाहता हैं। तो वह बहुत बड़ी समस्या हैं। 

आजकल जो पैसे गलत तरीके से कमायें या हमने गलत काम कर लिये तो कुछ लोगों को यह ज्यादातार देखने को मिल रहा हैं कि वे बोल रहे हैं कि दान दे दिया , एक पण्डित घर पर लगा लिया उन लोगों के लिये क्या सन्देश हैं। उससे क्या शान्ति आ सकती हैं?

मैं आपको एक बात बताऊ आप अच्छा करों या बुरा धर्म तो आप को करना ही पड़ेगा। ऐसा नहीं हैं कि आप के पास पैसे नहीं है तो आप धर्म नहीं कर सकते हो। धर्म तो हर एक व्यक्ति के स्वभाव में ही हैं। पर यहां जब सब आते हैं तो भाग जाते हैं। अपना स्वभाव बदल लेते हैं। दुनिया में जीना अलग तरीके से शुरू कर देते हैं। ये जो सारी चीजे हैं। धर्म तो सबने किया हैं जिन्होने दुसरे की हत्या भी की हैं। रावण को हम लोग राक्षस मानते हैं लेकिन वो धर्म करता था। इसका मतलब यह नही कि धर्म करना छोड़ दो। धर्म तो आपको जीनी सीखाता हैं। धर्म बताता हैं कि आप क्या करोगें क्या नहीं करोगें। लेकिन हां यह स्वभाव अच्छा नहीं हैं। की पहले आप दो नम्बर की कमाई करों फिर थोड़ा बहुत दान देकर अपने आप को दानी साबित करों। इससे अच्छा हैं कि एक नम्बर पर ही चलों दो नम्बर को छोड़ दो वरना सब खत्म।

अपनी युवा पीढ़ी भटक रही हैं?

युवा पीढ़ी को सबसे ज्यादा जरूरत हैं संस्कारों की, अपने माता-पिता द्वारा दिये हुये सम्मान की। और जब तक मां-बाप जिम्मेदार नहीं हैं। उस चीज को देखना चाहिये। माता-पिता को लगता हैं कि पैसा दे दो, व्यवस्था दे दो, पढ़ाई करा दो बस हमारी ड्यूटी पूरी हैं। पर इतना नहीं हैं हमें बहुत कुछ आगें उनको बताना पडेगा। उस समय से हमें बताना पढ़ेगा जब वह पढ़ाई का नाम भी नहीं जानते हैं। जब यह होता हैं तो बच्चे के सुधरने की उम्मीद होती है। 

आप ने जेल में भी प्रवचन दिये हैं आपको क्या लगता हैं जेल में बंदियों के लिये इसका कुछ महत्तव होगा?

मुझे बहुत अच्छा लगता हैं जेल में बंदियों को प्रवचन सुनाने में। प्रवचन के बाद कई कैदी वादा भी मुझसे करते हैं कि मै दोबारा ऐसा कोई काम नहीं करूगां जिससे हमें यहां दोबारा आना पड़े। ये भटके हुए लोग हैं जिनको गलत संग मिल जाता हैं। यह समाज के ऐसे दूषित कानून हैं जहां मजबूरी में किसी को फंसा देते हैं। फंसाना बहुत आसान हैं जिनके कुछ नहीं हैं। दो-तीन केस ऐसे हैं। जिनके बारे में कुछ पता नहीं चलता। जैसे दहेज-प्रथा में अब एक व्यक्ति ने कुछ गलती की। आप पूरे परिवार को अन्दर करा देते हैं। लेकिन अगर किसी के साथ कोई उत्पीडन हुआ हो तो लगता हैं कि सही भी हैं। तो ऐसे कुछ चीजे हैं जिनकी देखा-देखी भी बहुत कुछ होता हैं। अच्छा ये लगता हैं कि भगवान ने हमें इस लायक बनाया कि हम जायें और उन्हे कुछ समझायें। जो हममे हैं उन्हे देने की कोशिश करे। अच्छा तो तब लगता हैं जब लोग सुधरते हैं और सुधरने का प्रयास करते हैं।

विश्व शान्ति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट का क्या मुख्य उद्देश्य हैं?

संस्था का मुख्य उद्देश्य हैं कि धर्म का अत्याधिक प्रचार एवं प्रसार करना। नवजवानों को धर्म से जोडना, धर्म के माध्यम से शान्ति पहुंचाना। सामाजिक सेवा जितनी हो सके, भगवान ने जितनी शक्ति दी हैं। दीन-हीनों की सेवा करो और धर्म का प्रचार एवं प्रसार करों और बच्चों को संस्कार दो। 

हमारी पत्रिका के माध्यम से हमारे पाठको को कोई संदेश?

यहीं कहना चाहुंगा की सत्यमेव ज्यते। आप सत्य पर चलिये, नशा छोडिये, गुटखा खाना छोडि़ए और अच्छाई के मार्ग पर चालिए। अपने माता-पिता का सम्मान करिए। आपका और हमारा सबका भला हो। राधे-राधे

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