दीन दुखियों को हक़ दिलाना ही हो पत्रकारिता का मकसद

Posted by: Publlic Akrosh ADMIN Monday 5th of September 2016 11:57:09 PM

आज आपको तमाम न्यूज़ चैनल्स 24 धण्टे सातों दिन वर्षों से चलते नज़र आ रहे होगें और दिन पर दिन उनकी नंबर वन बनेने की होड़ भी जगजहिर है। पर उसी भीड़ में से अलग चैनल समाचार प्लस ने मात्र 2 वर्षों में उ0 प्र0 व उत्तराखण्ड में जो अपनी अलग पहचान बनायी है, उसमें चैनल के मैनेजिंग एडिटर अमिताभ अग्निहोत्री जी के अति महत्वपूर्ण योगदान को हम कभी नकार नही सकते। अपनी निडर, निर्भीक व बेबाक टिप्पणीयों से राजनीति के सूरमाओं से लेकर प्रशासन के आलाकमानों की बोलती बंद कर देने वाले अमिताभ जी का नाम और काम आज देश के हर घर में लोकप्रिय हो चुका है। देश की आवाम की आवाज को अपने मंच से बुलंद करने का एकमात्र मकसद लिये फर्रूखाबाद से दिल्ली के सफर में अपने 25 वर्षों के पत्रकारिता के अनुभव को अमिताभ जी ने एक खास मुलाकात में साझा किया हमारे चीफ एडिटर डा0 प्रदीप तिवारी जी से। प्रस्तुत है उनकी बातचीत के प्रमुख अंश-


सर आप मूल रुप से कहाँ के निवासी है और आपकी प्रारम्भिक शिक्षा कहाँ पर हुयी ?
मैं फर्रुखाबाद का रहने वाला हूँ और मेरी प्रारम्भिक से स्नातक तक की शिक्षा फर्रुखाबाद से ही हुई । उसके बाद मैं दिल्ली आ गया जहां पर मैने सूचना प्रसारण मंत्रालय के एक संस्थान इडिंयन इंस्टीट्यूट ऑफ मॉस कम्यूनिकेशन से पत्रकारिता की डिग्री ली।


आपने पत्रकरिता को ही कॅरियर क्यों चुना ?
देखिये, हिन्दुस्तान में दो तरह के लोग पत्रकार बनते हैं । 90 प्रतिशत वो लोग पत्रकार बनते हैं जो प्रतियोगिता से बचना चाहते हैं, क्योंकि इसमे कोई प्रतियोगिता नहीं होती, कोई भी कभी भी बन सकता है। मैं उस प्रजाति से अलग था, मैनें जब प्प्डब् की प्रवेश परीक्षा दी थी, उस वक्त मेरा आई.आई.एम में सलेक्शन हो चुका था, और देश में आई.आई.एम की अपनी अलग प्रतिष्ठा है। मैं इसलिए नही आया इस क्षेत्र में की मुझे पत्रकारिता ही करनी है या मैं कुछ और नहीं कर सकता।


पत्रकारिता को आप कैसे परिभाषित करेंगे ? आपने प्रिन्ट मीडिया में भी कार्य किया है। इलेक्ट्रानिक मीडिया में भी किया है। दोनो में मूलभूत अन्तर क्या है ?
पत्रकारिता, पत्रकारिता है। वो विधाओं से उसके बेसिक केरेक्टर में कोई फर्क नही आता। जैसे वर्किंग वूमेन, हाऊस वाईफ, मदर, सिस्टर सब मूल रुप से स्त्री हैं नारी हैं, उसके विविध रुप हैं। पत्रकारिता भी वैसी ही है। वो सब चीज़ मेरे लिए खबर है, जिसको जानने की उत्सुकता या उत्कन्ठा किसी में है। तमाम यूनीवर्सिटीज़ में सेमिनॉर में इसकी एक परिभाषा भी दी जाती है। मैं कभी वाइवा में पूछता हूँ कि  NEWS क्या है तो मुझे जवाब मिलता है - NORTH,EAST,WEST,SOUTH या 5W ये एक अपूर्ण परिभाषा है। सही परिभाषा यह है, ‘हर वो चीज़ जिसके बारे में जानने की किसी की भी उत्सुकता है, समाचार है।’ जैसे कोई कैटरीना कैफ़ के सैन्डल के बारे में जानना चाहता है तो कोई जानना चाहता है कि सचिन तेंदुलकर घर में क्या करते हैं, ये सब समाचार है।


आज लिखने में या बोलने में क्या पत्रकारिता का स्तर गिरा है पहले से ?
देखिए, अब पत्रकारिता झोला और खादी का कुर्ता और पैजामा तो नहीं कहूँगा, लेकिन एक चीज़ ज़रुर कहूँगा कि हिन्दुस्तान में आगे बदल जाए तो मैं नहीं कह सकता, मगर अपने 25 सालों में मैंने  नहीं देखा। लेकिन हिन्दुस्तान में अगर आप पत्रकारिता करना चाहते है तो आप एक चीज़ जरुर सीखें जो कबीरदास जी ने 360 साल पहले लिखा था , ‘‘ कबिरा यह घर प्रेम का, खाला का घर नाहीं, शीश उतारे हाथ धरि, सो बैठे घर माहीं’’ मतलब इस घर में वो आये जो अपना सर खुद काटकर अपने हाथ में रखने की हिम्मत रखता हो। आप सरकारी सेवा में चले जाएं, राजनीति में चले जाएं। सभी अच्छे पेशे हैं। पत्रकारिता का रास्ता बहुत कठिन है। वो कहते है न,‘‘ जिनके होठों पे हंसी, पाँव में छाले होंगें, हाँ वही लोग तेरे चाहने वाले होंगें।’’ तो पत्रकारिता वही लोग कर सकते हैं जो इस रास्ते पर चल सकें। 


अगर आज हम रिपोर्टरों को देखें तो कुछ एक बड़े शहर को छोड़कर सभी में नॅालेज की कमी देखने को मिलती है,क्या उनका स्तर भी गिरने लगा है ?
यदि आप किसी भी पेशे में छन्नी नहीं लगायेगें तो वो उसकी आभा खो देगा। अब देखिए, भारत में राजनीति कर छनन क्यों हुआ? हर चोर-उचक्का इसमें आ गया। आप किसी भी क्षेत्र में कार्य करें, आपको जालियों का इस्तेमाल तो करना ही होगा जिससे छन के चीजें आगे जाएं।


क्या मीडिया में चाहे वो प्रिन्ट हो या इलेक्ट्रानिक, खबरों को लेकर कोई मानक बनाने चाहिए ? 
मेरा तर्जुबा ये कहता है, कि एक अखबार में 350-400 खबरें छपती हैं और जो अंग्रेजी अखबार है, उनमें तो 800-900 खबरें छपती है। कितना भी बवाली मालिक हो उसकी रुचि की 5-7 खबरें ही होती हैं। अगर संपादक को 400 खबरें तय करनी है, जिसमें 4-5 खबरें मालिक का दबाव में गड़बड़ भी चली गयी तो 395 खबरें तो शीशे कि तरह साफ हैं। दरसल हम अपने गलत काम भी मालिक के खाते में डाल देते है, जबकि ऐसा नही होना चाहिए। इसमें मालिक की क्या गलती। मालिक तो रोज व्यक्तिगत रुप से अपने सभी रिपोर्टरों को खबरों के लिए नहीं बोल सकता। ये तो लोकल रिपोर्टर की ज़मीर है कि वो अपने काम के प्रति कितना ईमानदार है।


क्या आज पत्रकारिता में कलम की ताकत कमजोर हो रही है ?
देखिए, मैं तो एक बात मानता हूँ कि आज पत्रकारिता लठैती भी नहीं है। पत्रकारिता का मूल जो मैनें अनुभव किया जिस पर मैं अमल करता हूँ, कि जो व्यक्ति राजनेताओं, विधायिका , कार्यपालिका , न्यायपालिका तक अप्रोच न कर पाये तो उनकी बात को प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या सासंदों तक पहुँचाने के लिए मैं मंच देता हूँ। उनके हितरक्षक के तौर पर लड़ाई भी करता हूँ। ये साहस तो मुझे पैदा करना पड़ेगा कि मैं सरकार की प्रसन्नता की चिन्ता करता हूँ या अपने देश के आवाम की। यह नैतिकता अगर आपके अन्दर होगी तभी आप एक सफल पत्रकार कहलायेगें। इसी आधार पर काम करके हम समाचार प्लस को मात्र डेढ़ साल में टॉप 3 में लेकर आए हैं। वरन् 10-12 सालों में भी ये मुकाम नहीं मिलता।
 
सर आपने अभी तक किन-किन अखबार व चैनल्स में काम किया है ?
मैं बहुत नौकरी बदलने वाला आदमी नहीं रहा हूँ । IIMC  से टॉप करने के बाद मैनें ‘दैनिक जागरण’ से पत्रकारिता प्रारम्भ की। कॉफी संघर्ष के बाद मैं ‘आज’ के नेश्नल ब्यूरो में चला गया उसके बाद फिर दैनिक भास्कर का नेश्नल ब्यूरो हेड किया। इस दौरान कई चैनल्स में एक्सपर्ट के तौर पर भी जाता था तो लाईट,कैमरा,साउण्ड से भी यूज़ टू हो गया। एक मित्र के बुलावे पे मैं दिल्ली एन.सी.आर. के एक चैनल ‘टोटल टीवी’ पर भी गया तो दोनों ही प्रकार की मीडिया का अनुभव हो गया था, मगर किसी चैनल को शुरु होते हुए देखने की परिकल्पना समाचार प्लस में ही पूरी हुई। 
  
नये पत्रकारों को आप कोई सलाह या कोई संदेश देना चाहे ?
ये सलाह और संदेश देना मेरा काम नहीं है। एक बार गाँधी जी से पूछा गया कि जब आप नहीं रहेगें तो सलाह कौन दिया करेगा, तो उन्होनें कहा कि जब भी कोई निर्णय करना तो ये जरुर सोचना कि हिन्दुस्तान का जो सबसे गरीब आदमी है, उस पर तेरे इस फैसले का असर अच्छा पड़ेगा या बुरा, और जो तेरी आत्मा कहे वही बापू की आवाज़ मानकर कर लेना। मेरी पत्रकारिता से देश के दीन,दुखी, पीड़ित,शोषित लोगों को यदि लाभ नहीं हुआ तो बेकार है। मेरी पत्रकारिता देश के नेताओं, अधिकारियों या उद्योगपतियों को प्रसन्न करने के लिये नहीं, बल्कि जो लोग पीड़ित, शोषित है अगर हम उनकी सहायता कर पायें तो हमारा पत्रकार होना सफल है। मेरी पत्रकारिता ही मेरी पूजा है और यही उनके लिए मैसेज है।


अभी तक का कोई यादगार पल जो हमारे साथ शेयर करना चाहेगें? 
एक माँ से ये पूछा जाये कि उसकी सबसे प्यारी संतान कौन सी है, तो शायद वो जवाब न दे पायेगी। वैसे ही आपका सवाल है। लेकिन,एक वाक्या मुझे आज भी याद है वो 1992 का समय था, नरसिम्हा राव जी की सरकार थी। अयोध्या आंदोलन चरम पर था, उस वक्त देश ही नहीं दुनिया के तमाम अखबारों व चैनलों में अयोध्या की ही चर्चा थी। हर आदमी यह जानना चाहता था कि कारसेवा की तारीख कौन सी होगी। उस दौरान मैं जागरण में था और मैनें लिखा कि कारसेवा 6 दिसंबर से शुरु होगी, जिसकी घोषणा 3 दिन बाद होनी थी। उन 3 दिनों तक मैं यही सोचता रहा कि अगर मेरा अनुमान गलत हुआ तो नौकरी के साथ-साथ मेरा कॅरियर भी डगमगा जायेगा। लेकिन कारसेवा की तारीख की घोषणा होते ही मेरी खबर पर मुहर लग गयी। उस दिन मेरा आत्म विश्वास और अधिक बढ़ गया जिसने मुझे कॉफी प्रेरित किया। 
 

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