जनता के लिए ही बना है जनसेवक अमरजीत सिंह जनसेवक

Posted by: Tauseef Monday 21st of September 2015 04:20:57 PM


फतेहपुर उत्तर प्रदेश के बिन्दकी के एक साधारण से किसान के परिवार में जन्में अमरजीत सिंह को उनके विधान सभा क्षेत्र के साथ ही प्रदेश भर की जनता ‘जनसेवक’ के नाम से ज्यादा जानती है। उसका कारण भी है इन्होंने अपना व्यक्तिगत जीवन समाजसेवा के नाम जो कर दिया है। बचपन से ही समाजसेवा को समर्पित अमरजीत सिंह ने राजनीति में आने के बाद भी समाज सेवा जारी रखी और उसी कारण इनको ‘जनसेवक’ की उपाधि दी गयी। अपने करीब 20 साल के राजनीतिक सफर में विधायक से लेकर मंत्री रहे अमरजीत सिंह ‘जनसेवक’ की पिछले दिनों भेंट हुयी हमारे चीफ एडिटर डा0 प्रदीप तिवारी से। प्रस्तुत है उस ख़ास मुलाकात के कुछ प्रमुख अंश - 
आप कहाँ के मूल निवासी हैं और आपकी प्रारम्भिक षिक्षा कहाँ से हुई ?
मेरा जन्म उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले के एक किसान परिवार में हुआ, प्रारम्भिक शिक्षा भी मेरी गांव में ही हुई। जब हम कक्षा-2 में थे तब खेल-खेल में हम लोग बिन्दकी रोड स्टेशन पर ट्रेन देखने गये और शरारत में ट्रेन पर चढ़ गये, कुछ दूर ट्रेन चलने के बाद मेरे दोस्त डर के मारे उतर गये पर मैं नहीं उतरा। बिना टिकट यात्रा करने पर मुझे इटावा स्टेशन पर पकड़ लिया गया। स्टेशन मास्टर मुझसे बात करने करने के बाद मुझे अपने घर ले गये और उन्होनें ही मेरा दाखिला इटावा के एक स्कूल में करा दिया। स्कूली शिक्षा ग्रहण करने के बाद उन्होनें ही मुझे आगरा यूनिवर्सिटी में एडमिशन दिलाया। जहाँ से मैनें विद्यार्थी जीवन के साथ-साथ राजनीतिक जीवन की शुरूआत की।

राजनीति में आने की प्रेरणा कहाँ से मिली ?
राजनीति में तो मैं अपने विद्यार्थी जीवन से ही सक्रिय हो गया था। लेकिन लीडरशिप के गुण मेरे अन्दर बचपन से ही थे। कक्षा 5 में मैं माॅनीटर था। इण्टर कालेज में मैनें छात्र संघ का गठन की। फिर कालेज में आने के बाद आगरा कालेज में भी छात्र संघ का पदाधिकारी रहा। उस वक्त परिवार की माली हालत अच्छी न होने के कारण हम सक्रिय राजनीति का हिस्सा नही बन पाये। जनता पार्टी के हुकूमत के वक्त हमने बहुत संघर्ष किया। लेकिन आर्थिक स्थिति ठीक न होने के कारण विद्यान सभा चुनाव नहीं लड़ पाये। उसी दौरान 2 फरवरी 1974 को, बांदा रेलवे स्टेशन पर एक दुर्घटना में मुझे अपना हाथ गंवाना पड़ा। जिस पर लोगों ने तमाम तरह की बातें की। मैं संघर्षशील विचारधारा का हूँ अतः उस दुर्घटना के बाद मैनें ठानी की अब निशक्त होने के बावजूद कुछ ऐसा कर दिखाऊंगा जिससे गांव, शहर, प्रदेश में ही नहीं पूरे देश में लोग मुझे पहचानें।

इस दुर्घटना के बाद आपके जीवन में या विचारधारा में क्या कोई विशेष बदलाव आया ?
इस दुर्घटना के बाद मुझे एहसास हुआ कि एक विकलांग का जीवन कितना कठिन होता है। मुझे लगा कि विकलांगों से ज्यादा कमजोर दुनिया में कोई नही है। अतः मैनें सोच लिया कि विकलांगों को ताकतवर बनाने के लिए मुझे कितना ही संघर्ष करना पड़े मैं करूंगा। मैनें भारत के अलग-अलग प्रदेश में जाकर विकालांगों को एकजुट किया और उन्होने मुझे अपना राष्ट्रीय अध्यक्ष चुन लिया। उस वक्त समाज कल्याण बोर्ड की चेयरमैन श्रीमति सुशीला रोहतगी ने हम लोगों को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी जी से मिलवाया, जिनसे हमने सबसे पहले एक मांग रखी की विकलांगों को राज्यसभा और विधान परिषद में मनोनीत किया जाये। इसके लिए हमने सभी राजनीतिक पार्टीयों से गुहार भी लगाई। परन्तु सभी ने किनारा कर लिया, तो मुझे लगा कि जब कोई चीज़ मागने से न मिले तो उसे संघर्ष से प्राप्त करना चाहिए। मेरा संघर्ष जारी रहा और अतंतः भारतीय जनता पार्टी ने 1990 में मुझे फतेहपुर के बिन्दकी विधानसभा से चुनाव लड़ने के लिए टिकट दिया। उस चुनाव में मैं भारी मतों से हारा। लेकिन मैनें हिम्मत नही हारी, मैं प्रयत्नशील रहा क्षेत्र में लगातार कार्य करता रहा, जिसके फलस्वरूप अगले चुनाव में मुझे सफलता हासिल हुई और मैं बिन्दकी से विधायक बना।

भाजपा को छोड़ सपा में आने का प्रमुख कारण क्या रहा ?
अपने विद्यार्थी जीवन से ही मैं नेता जी माननीय मुलायम सिंह जी को आदर्श मानता आया हँू। भाजपा के कार्यकाल में जब मैं मंत्री था तब भी मेरे शिवपाल यादव जी से घरेलू सम्बन्ध थे, 2003-2005 में दो सरकारें थी। सपा की सरकार से लोकदल और कांग्रेस ने अंतिम क्षणों में अपना समर्थन वापस ले लिया। उस वक्त मुलायम सिंह जी मुख्यमंत्री थे, उन्होने शिवपाल जी के माध्यम से मुझे बुलाया और सपा में आने की बात कही। आपसी प्रेम और मित्रता के कारण मैं उनकी बात को नहीं काट पाया और मैनें सपा का दामन थाम लिया। हांलाकि 2007 में मायावती जी की सरकार आई और 5 सालों के लिए सपा सत्ता से दूर हो गयी। मगर 2012 में फिर से सपा सत्ता में आई और अखिलेश यादव ने प्रदेश की कमान संभाली।
  
आप दो राजनीतिक पार्टीयों से जुड़े, दोनो में आपने क्या मौलिक अंतर पाया ?
देखिए, हर पार्टी के अपने अलग सिद्धान्त होते हैं, तो अंतर तो होगा ही। 

दोनों पार्टीयों मंे समानता की बात करें तो इस पर क्या कहेंगे आप ?
कुछ ऐसी चीज़ें हैं जिनको सारा देश जानता है, जो सभी पार्टीयों में कामन है। मगर उनको कैमरे के सामने नहीं बताया जा सकता। आप ये मान लीजिये की राजनीतिक आदमी सच बोलने की क्षमता नहीं रखता है, चाहे वो सत्ता पक्ष में हो या विपक्ष में। राजनीतिक व्यक्ति चाहे किसी भी राजनीतिक दल का हो, लेकिन वह अच्छाईयों, बुराईयों, गुण, दोष के आधार पर चर्चा करे तो शायद इसमें कुछ सुधार आये। जो शायद ही संभव हो पाए राजनीति में।

‘जनसेवक’ अब पूरी तरह ‘राजनीतिक’ हो गया है, क्या कहेगें इस पर ?
देखिए, मैं चुनाव लड़ चुका हूँ तो राजनीतिज्ञ की छवि तो है ही मेरी, मगर उससे पहले मैं जनता की सेवा करता आया हूँ तो पहले मैं जनसेवक हूँ।

आपको राजनीति में 25 साल हो गये। आपकी नज़र में इन 25 साल की राजनीति में क्या बदलाव आया है।
बहुत ज़्यादा बदलाव आया है राजनीति में, पहले विधायक का, जनप्रतिनिधियों का बहुत सम्मान हुआ करता था। समय में परिवर्तन के साथ लोगों की सोच भी बहुत बदल चुकी है। अब वो इज़्ज़त, वो सम्मान किसी भी क्षेत्र में नहीं रह गया।

2017 के चुनाव की बात करें तो क्या आप मानते हैं कि समाजवादी पार्टी के ग्राफ में गिरावट आयेगी ?
उत्तर प्रदेश में आज़ादी के बाद से इतना कर्मशील, इतना दृढ़निश्चयी और इतना काम करने वाला मुख्यमंत्री शायद ही कभी रहा हो। उन्होने प्रदेश की जनता के लिए अतुलनीय कार्य किया है। लोगों का ये मानना गलत है कि मुख्यमंत्री स्वतंत्र होकर कार्य नहीं कर पा रहे या पार्टी का ग्राफ नीचे गिर रहा है। उनके कार्य करने के तरीके पर कोई उंगली नही उठा सकता। इतने विभागों का कार्य देखने के बावजूद उनके चेहरे पर जरा भी तनाव नही रहता। 2017 मे समाजवादी पार्टी फिर से अपनी सरकार बनायेगी और विधान मण्डल में एम.एल.ए की संख्या पहले से ज़्यादा होगी।

आपको ऐसा नहीं लगता कि आप अगर भाजपा में होते तो ज्यादा ऊंचाईयों पर होते ?
देखिए, बात ऊचाईयों कि नही है, आज हर व्यक्ति का जीवन एक डोर से बंधा होता है। चाहे वो किसान हो, मजदूर हो, नेता हो या पत्रकार हो। हमारी जीवन डोर हमें कहाँ से कहाँ ले जायेगी से किसी को पता नहीं होता है।

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