आई.एम.ए की प्रेसीडेन्ट प्रोफेसर डा0 आरती दवे लाल चंदानी चीफ एडिटर डा0 प्रदीप तिवारी से एक मुलाकात

Posted by: Tauseef Monday 21st of September 2015 04:37:01 PM


कानपुर के साथ-साथ प्रदेश भर में दक्षिण भारत की तर्ज पर स्वास्थ सेवाओं का सपना देखने वाली यू.पी.मेडिकल टीचर्स एसोसियेशन, कानपुर व आई.एम.ए की प्रेसीडेन्ट प्रोफेसर डा0 आरती दवे लाल चंदानी ने जब हमारे चीफ एडिटर डा0 प्रदीप तिवारी से एक मुलाकात में शेयर किये अपने आई.एम.ए की प्रेसीडेन्ट के पद पर 7 माह के कार्यकाल और सरकारी अस्पतालों की वर्तमान स्थिति तो सामने आया हमारी उ0प्र0 सरकार की स्वास्थ सम्बन्धी योजनाओं और उपलब्धियों का सच। प्रस्तुत  है जी.एस.वी.एम. मेडिकल कालेज की डायरेक्टर डा0 आरती लाल चंदानी से हमारे चीफ एडिटर डा0 प्रदीप तिवारी के बीच हुई बातचीत के प्रमुख अंष।
डा0 साहब आपकी प्रारम्भिक शिक्षा कहां से हुई ?
मैं बचपन में पटना के माउंट कार्मल स्कूल में पढ़ी उस वक्त वो बहुत ही अच्छा स्कूल हुआ करता था और उम्मीद करती हूँ कि आज भी होगा। वहाँ पर मिश्नरी के टीचर्स हुआ करते थे, जो माॅरल सांइस की शिक्षा बहुत अच्छी देते थे साथ ही स्पोर्टस, एक्सट्रा कॅरिक्युलर एक्टिविटीज पर भी खासा ध्यान दिया जाता था, एक खास बात और थी कि उनकी इंग्लिश बहुत अच्छी हुआ करती थी। वहाँ पर मैंने क्लास 6 तक की पढ़ाई की। इसके आगे की पढाई मैंने दिल्ली के फै्रंकैम्पनी पब्लिक स्कूल से की। वो मेम्बर आॅफ पार्लियामेंन्ट मि. फै्रकेम्पनी का स्कूल था, और वहां पर माॅरल और एथिक्स पर विशेष ध्यान दिया जाता था। 
आपने अपना एमबीबीएस कहां से किया? 
मेरा एमबीएबीएस फिर एमडी, फिर डीएम,  लेक्चरर जाॅब, एसीटेन्ट प्रोफेसर और हेड आॅफ डिपोर्टमेंट ये सब कुछ मैंने कानपुर से ही किया। मैं 74 में दिल्ली से कानपुर में आई और आज लगभग 40 साल हो गये हैं। इसके अलावा एक और इंट्रेस्टिंग बात है कि मेरा जन्म भी कानपुर मंे 1995 में उर्सला होर्समैन मेमोरियल हास्पिटल मंे मंे हुआ था। 
क्या आपके पारिवारिक बैकग्राउंड मंे ओर भी लोग डाक्टर रहे है ?
जी हाँ! मेरे परिवार मंे ज्यादातर महिलाएं डाक्टर्स हैं। मेरी मदर भी डाक्टर थीं और समाजसेवा भी करती थी। जिसको देख कर मुझे भी दूसरों की सहायता करने का मन करता था। मेरी मां बर्मा की रहने वाली थी जो दूसरे विश्व युद्ध के बाद माइग्रेट होकर भारत आ गई थी और आगरा मेडिकल कालेज में पढ़ी, उनकी जीवन का उद्देश्य था कि बहुत खुश रहो और दूसरों को भी खुश रखो। 
डा0 साहब जैसे की आप बचपन से ही डाक्टर्स परिवार में पली-बढ़ी, तो आपने मरीजों का डाॅक्टर से पहले समय के व्यवहार को भी देखा होगा। मगर आज अक्सर देखने को मिलता है कि तीमारदार डाक्टर्स पर ही ब्लेम लगाते है ऐसा क्योें ? देखिये, डाक्टर्स भी वही हैं, मरीज भी वही हैं। हम कह सकते है कि कहीं न कहीं डाक्टर उनके एक्सपेक्टेशन मीट नहीं कर पाते। हमारे पास भी अपनी कुछ लिमिटेशन्स हैं। ऐसा नहीं है हम उन्हें कुछ देना नहीं चाहते। मैं तो एक गर्वमेंट जाॅब में हूँ हम खुद चाहते है कि जैसे ही मरीज आये उसे तुरन्त इलाज मिले और डाक्टर्स जल्द अटैंड करे, लेकिन क्या कहे इस वक्त मरीजों व डाक्टर्स का रेशियों भी गड़बड़ा गया हैं। हम चाहते है कि उन्हे अच्छी से अच्छी दवायें उपलब्ध करायी जाये लेकिन जनसंख्या इतनी बढ़ गयी कि जिसके कारण मरीजों में बढ़ोत्तरी हुई है। जिसकी वजह से यह चाह कर भी सब सम्भव नहीं हो पाता। 
क्या ये डाक्टर्स और पेसेन्ट के रेशियो की वजह से हैं या फिर हम कहे डाक्टर्स के पेशे का व्यवसायीकरण हो चुका है, तो इस पर आप क्या कहेंगी ?
नहीं! ऐसा बिल्कुल नहीं हुआ है, आज महगांई बहुत बढ़ गयी है लाइफ बहुत फास्ट हो चुकी हैं और आज आप को फास्ट लाइफ में ही समाना पड़ता है। फास्ट लाइफ लीड करने के लिए डाक्टर्स के लिये भी कुछ चीजें जरूरत बन चुकी है। जैसे मोबाइल फोन, गाड़ी, स्मार्ट हाउस, मैनपॅार, अच्छा डेªेसिंग, समय से और संतुलित भोजन आदि और इन सबके लिये हमको भी पैसे कमाने पड़ते हैं।  दूसरी बात जो आपने कही डाक्टर्स रेशियों की वह बिल्कुल सही है। आज जितनी तेजी से आबादी बढ़ रही है उतनी तेजी से डाक्टर्स की संख्या मंे इजाफा नहीं हो रहा हैं। ना ही मेडिकल काॅलेज बन रहे है और न ही कितने खाली पड़े डाक्टर्स के पोस्ट भरे जा रहे है। क्योंकि आपको डाक्टर को अट्रैक्ट करना है उनके स्टेट्स के आधार पर उनकी सैलरी देनी है डाक्टर्स के पास बहुत सारी दिक्कतें है, अगर हम गम्भीर स्थिति वाले मरीज का ईलाज करंे तो डाक्टर्स के सामने यह भी समस्या होती है कि वह मरीज मर भी सकता है और अगर वह मर जाता है तो उसके परिवार के लोगों का आक्रोश झेलने मंे भी बहुत दिक्कत होती हैं। उस आक्रोश के दौरान मरीजों के तीमारदार, डाक्टर्स पर अटैक भी कर सकते है। जिसके लिये डाक्टर्स के पास कोई सिक्योरिटी नहीं है। देखिये जो मरीज डाक्टर्स के पास आते है ऐसा तो नहीं है कि उनकी कभी मौत नहीं होगी। ज्यादातर देखने को मिलता है कि एक स्वस्थ व्यक्ति डाक्टर्स के पास नहीं जाता है। जब एक साधारण व्यक्ति या स्वस्थ व्यक्ति मर सकता है तो एक मरीज के मरने की सम्भावनाएं ज्यादा होती है। मरीज के मरने के बाद उनके परिजन डाक्टर्स की फीस नहीं देना चाहते। दवाओं व हास्पिटल का पेमेंट नहीं करना चाहते क्योंकि उनका मरीज मर चुका होता है। ऐसी स्थिति में हास्पिटल या डाक्टर कैसे मरीज का बिल पेमेंट करे।
आज सरकारी अस्पतालों में वो सारी सुविधाये नहीं होगीं जो प्राइवेट अस्पतालों में है , प्राइवेट हास्पिटल मे 8-10 दिनों तक मरीज को आईसीयू मंे रखना सबके बस की बात नहीं। क्या ये सुविधाये सरकारी अस्पतालों में नहीं हो सकती ? क्या आपने आईएमए प्रेसिडेंट होने के नाते पिछले सात महीनों में ये मुद्दा उठाया है ?
ये बात बिल्कुल सही है कि सरकारी अस्पतालों में वही लोग आते है जो बड़े खर्चे वहन नहीं कर सकते। इसकी वजह यही है कि हमारे सरकारी अस्पतालों व डाक्टर्स के ऊपर जो आईएस बैठे है वो इन छोटी-छोटी चीजों की जरूरत महसूस नहीं करते, जैसा हाल ही में हमारे यहाँ एक माली की मौत हो गयी, हमारा जूनियर इंजीनियर रिटायर हो गया। कई रिटायर कर्मचारियों की मौत हो गई और कई छोड़कर दूसरी जाॅब में चले गये। इन सभी की जगह नई नियुक्ति करना बहुत अर्जेण्ट है लेकिन यहाँ तो सालों हो जाते है कोई नियुक्ति नहीं होती है। अगर कोई डाक्टर अपने आगे की पढ़ाई करने जाता है या जाॅब चेंज करके कहीं और चला जाता है तो उनका रिपलेस्मेंट तुरन्त हो जाना चाहिये। जो हमारे हमारे हाथ मंे नहीं होता। अभी कुछ दिन पहले आपने पढ़ा होगा कि हमारे पास ट्राली,स्ट्रेचर तक नहीं है जिसकी हम सरकार से काफी समय से मांग कर रहे हैं लेकिन उसको भी खरीदने की एक प्रक्रिया होती है जिसमें काफी समय लग जाता है। 
क्या उसके लिये डायरेक्ट फंड नहीं है जो यहाँ से सीएमओ द्वारा रिलीज किया जा सके ?
नहीं यहाँ पर ऐसा कोई फंड नहीं है और मरीजों से जो यूजर चार्ज लिया जाता हैं वो भी डायरेक्ट सरकार के खाते मंे जाता है उसका कोई प्रयोग नहीं कर सकता। ये सारी चीजे डाक्टर्स के हाथ में नही है ये उन लोगो को ध्यान देना चाहिये जिनके हाथ में एडमिनिस्ट्रेशन रहता है। आप देखे तो अस्पताल के अलावा सड़के, पानी, बिजली, समेत काॅफी स्थितियाँ खराब है इसको आप एडमिनिस्ट्रेशन की कमी ही कहेंगे लेकिन जहाँ जान की बात आती है वहाँ पर तो कम से कम ऐसी लापरवाही नहीं होनी चाहिये। इसके लिये हमने सरकार को अनगिनत चिठियाँ लिख कर भेजी। 
हमारे यहाँ बहुत अच्छे डाॅक्टर्स हैं जो सरकारी अस्पतालों में कार्यरत है ? लेकिन अक्सर सुनने में आता है कि मरीज कहता है कि हम डाक्टर्स को उनके अपने बंगले या क्लीनिक पर दिखाये ऐसा क्यों ?
देखिये मरीज ऐसा इसलिये सोचता है अस्पतालांें में बहुत ज्यादा भीड़ रहती है बहुत से लोग जो अफोर्ड कर सकते है या जिनकी हालत सीरियस होती है वो अक्सर भीड़ से हटकर दिखाना चाहते है और हम भी यही चाहते है कि जो अफोर्ड कर सकते है वे प्राइवेट अस्पतालों मंे जा सकते है क्योंकि सरकारी अस्पताल में वे लोग आते है जो महंगा ईलाज नहीं करवा  सकते है और हम लोग आईसीयू में भी उन्ही मरीजों को ही लेते है जो बेचारे कहीं नहीं जा सकते। क्योंकि प्राइवेट अस्पतालों मंे आईसीयू में एक दिन का खर्चा 20 हजार तक आता जाता है। हमारी राय मंे यहाँ पर गर्वनमेंट को दक्षिण की तरह सिस्टम कर लेना चाहिए। जैसे कि वैल्लूर के क्रिसचियन मेडिकल कालेज मंे है। वहाँ डाक्टर्स की तीन ओपीडी चलती है। एक जनरल ओपीडी होती है जिसमें एक रूपये में पर्चा बनता है, एक स्पेशल ओपीडी होती है , और एक वीआईपी ओपीडी होती है। स्पेशल ओपीडी में करीब 300 रूपये लेते है और वीआईपी मंे 1000 रूपये लेते है। स्पेशल और वीआईपी में डाक्टर्स को उनका शेयर मिल जाता है और बाकी हास्पिटल को चला जाता है। 
भारत मंे करीब तीन चार सौ मेडिकल कालेज है लेकिन पीजी स्तर पर इसकी संख्या नहीं बढ़ी। ऐसा क्यों ?
इसके लिये एक साॅल्युशन हमने भी एमसीआई मंें दिया था। जिसको हम लोग परस्यु भी कर रहे हैं ये एक इंटीग्रेटेड कोर्स होना चाहिये जैसा कि बाहर होता है। अभी एक डाक्टर बनाने में 9 साल लग जाते है। जिसमें सरकार का भी अच्छा खासा खर्चा हो जाता है। पूरी इंटर्नशिप में वो पीजी की तैयारी में लगे रहते है। कोई काम भी नहीं करते। इसी को देखते हुये अगर इन्टीग्रेटेड कोर्स कर लिया जाये इसके साथ जिसमें कि उसे सीधे एमडी कि डिग्री मिले। जैसा कि कई देशों में हो भी रहा है और वह सीधे उसमें स्पेशलिस्ट बनें। जिसमें तीन साल उसे बेसिक साइंस के बारे मंे पढ़ाया जाये और तीन साल जिसमें वे स्पेशलिस्ट बनना चाहते है, क्योंकि अगर किसी को हड्डी का डाक्टर बनना है तो उसको गायनो की डीप नाॅलेज की आवश्यकता नहीं हैं उसी तरह एक एमडी फिजिशियन को सब चीज की नाॅलेज चाहिये। आर्थो वाले एमएस आर्थो की डिग्री मिले 6 साल बाद जिससे उनका एक साल पीरियड भी कटडाउन हो जायेगा, इंटर्नशिप का। 6 साल बाद उसको 2 साल किसी गांव मंे रखा जाये जहाँ पर उसे तरह-तरह के मरीज भी मिलेंगे और उसे अपने सुपीरियर्स के अंडर में काम करने का मौका भी मिलेगा और एक साल की बजाय दो साल इंटर्नशिप भी हो जायेगा और यह सबके लिये होना चाहिये। गर्वनमेंट के लिये ये बहुत फायदेमंद स्कीम होगी। 6 साल बाद उनको आउटपुट भी मिलने लगेगा, डाक्टर्स के काम का। ऐसा करने मंे डाक्टर्स को भी कोई दिक्कत नहीं होगी। क्योंकि इन दो सालों में उनको सैलरी मिलेगी। अभी तो उनको 8-9 साल तक कुछ भी पैसे नहीं मिलते। इस स्कीम का सबसे अच्छा फायदा ये होगा कि 6 साल की पढ़ाई के बाद डाक्टर्स को तन्ख्वा भी मिलने लगेगी और सरकार को डाक्टर्स। ये उनके लिये हो जो क्वालीफाइड हो।
 
आईएमए प्रेसिडेंट के पद पर आपको सात माह हो चुके है  कैसा अनुभव रहा और क्या समस्यायें आयी इस दौरान ?
आईएमए प्रेसिडेंट के पद पर मैंने देखा कि समस्यायें तो कुछ भी नहीं है लेकिन अगर किया जाये तो बहुत कुछ है करने के लिये इस दौरान हमने समाज के लिए बहुत कुछ किया और डाक्टर्स के लिये हर शुक्रवार बहुत अच्छे टयू्टोरियलस शुरू करें। जो साल मंे एक बार एक हफ्ते का रिफेशर कोर्स होता था। वो अब हर हफ्ते आईएमए ट्यूटोरियलस के फाॅम में जिसमें हम कई सब्जेक्ट्स कवर करते है। जिसमें हमारे सुपर स्पेशलिस्ट डाक्टर्स मौजूद रहते हैं। इसके साथ हमने आउट स्टैडिंग सीएमई कराया। जिसको हम बाहर के कारर्पोरेट से ही कराते हैं उनसे हम यहाँ के आईएमए के लिये, डाक्टर्स के लिये फंड लेते हैं और वो फंड हमारे यहां काम भी आये। जिससे हमारे पास अच्छा बैलेंस भी बन गया। सीएमई द्वारा अगर बाहर के चार डाक्टर्स होते है तो हमारे शहर के भी चार डाक्टर्स होते है। ऐज़ आ स्पीकर जिससे बाहर और यहाँ पर दोनों ही जगह पर प्रयोग हो रही अच्छी टेक्नोलाॅजी का आदान प्रदान हो जाता है। जिसका हमारा मकसद यही होता है कि हमारे मरीजों को ईलाज के लिये बाहर न जाना पड़े। इन सबके साथ-साथ मैंने आईएमए के लिये इंटरटेनमेंट, कलर्चरल, प्रोग्राम्स भी किये। जो एक्सस खर्चे थे उनको कटडाउन कर दिया। प्रेस काॅन्फे्रसस की संख्या बढ़ा दी। जिससे पब्लिक मंे मेडिकल अवेयरनस हुई, हमने कई हेल्थ कैम्प भी किये। शहर में कोई भी पब्लिक इश्यू होता है तो आईएमए उसे तुरंत टेकअप करता है। अभी शहर मंे पोलिंग होने वाली है इसके लिये हमने एक यह पहल की है कि कोई भी व्यक्ति जो वोट दे के आने क बाद अपनी उंगली पर लगा निशान डाक्टर्स को दिखाता है तो उसको डाक्टर अपनी कंसलटेन्सी फीस पर 50 प्रतिशत की छूट देगा। 
आप हदृय रोग स्पेशिलिस्ट है साथ ही आईएमए मंे भी आपकी व्यवस्तता रहती है। परिवार के लिये कैस वक्त निकालती हैं ?
किस्मत से, मेरे पति भी डाक्टर है, मेरे दोनों बच्चे भी डाक्टर है वो भी पूरी तरीके से मेडिकल लाइन में इन्वालव है, मेरी बेटी एमएस (ईएनटी) कर रही है और बेटा भी इंटर्नशिप कर रहा है। इसके बाद पीजी करेगा। 
क्या आप कानपुर मंे कार्डियोलोजिस्ट की कमी महसूस करती है ?
कार्डियोलाॅजिस्ट की बहुत कमी है शहर में अगर आप क्वालीफाइड कार्डियोलाॅजिस्ट की बात करे तो शहर में इनकी सख्ंया 8 से ज्यादा नहीं है। जिन्होंने डीएम कार्डियोलाॅजिस्ट किया हो। हम लोगों को यहाँ पर कार्डियोलाॅजिस्ट बढ़ाने के लिये उनकी सुविधाओं पर, सैलरी  आदि जरूरतों पर ध्यान देना होगा। सुपर स्पेशिलिस्ट की सैलरी ज्यादा होनी चाहिये। ताकि वो प्राइवेट में न जा पाये और यहीं पर अपने स्किल का प्रयोग करें। 
डा0 साहब कार्डियेक पेशेन्ट को क्या सावधानियाँ बरतनी चाहिए ?
अगर पहले से ही पेशेन्ट कार्डियेक है तो उसको वो सब चीजें तो करनी ही चाहिये जो एक साधारण पेशेन्ट के लिये जरूरी है। इसके अलावा उसको एक रेग्युलर कार्डियेक कंस्लटेंट के सम्पर्क में रहना चाहिये। जिससे उसका रेग्युलर चेकअप हो सके और उसे कभी ये नहीं समझना चाहिये एक बार लिखी दवा हमेशा चलती रहेगी। क्योंकि नयी नयी दवायें आती है उनको डोजेज चेंज होते है। अलग -अलग उम्र, वातवरण, रहन-सहन के लागों को अलग-अलग दवाओं की जरूरत पड़ती है। लेकिन एक साधारण व्यक्ति को अगर इससे बचना है तो कुछ बहुत साधारण से उपाय है जो उसे रेग्युलर करने चाहिये। जैसे- बहुत अधिक टेंशन नहीं लेनी चाहिये, गर्मियों में काॅटन के ढीले कपड़े पहनने चाहिये। और सर्दियों में ऊलेन कपड़ों से शरीर को ढक कर निकलना चाहिये। फूड हैबिट्स एकदम साधारण होने चाहिये। फास्ट फूड कैमिकल युक्त मसालों से बचना चाहिए। नये-नये फूड्स नहीं ट्राई करने चाहिये। दिन के भोजन में दाल, चावल, रोटी, सब्जी, फल का प्रयोग करना चाहिए। हो सके तो दिन मंें एक बार ड्राई फू्रट्स भी लेने चहिये। जिससे आप स्वस्थ रहें। तनाव मुक्त जीवन के लिये सभी को अपने व्यस्त दिनचर्या से समय निकलाकर परिवार और मित्रों के साथ कुछ समय बिताना चाहिये और खुश रहना चाहिये।
 

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