अपराध और अपराधियों से निपटना हम बखूबी जानते हैं - अमिताभ यश ;डी.आई.जी. बांदा

Posted by: Publlic Akrosh ADMIN Monday 5th of September 2016 11:25:31 PM

वर्ष 1971 में 11 अप्रैल को भोजपुर बिहार के श्री राम यश सिंह के घर जन्में और वर्तमान समय में भारतीय पुलिस सेवा में रह कर देश की सेवा कर रहे 1996 बैच के तेज तर्रार अधिकारी अमिताभ यश उन चुनिन्दा आईपीएस अफसरों में से एक हैं, जिन्होंने कई दशकों से आतंक का पर्याय बने ददुआ, ठोकिया और निर्भय गुर्जर जैसे डकैतों का खात्मा कर अपना नाम सारे देश में रोशन किया। उनकी बहादुरी व निडरता के चलते उनकी तैनाती उसी जिले में की गयी जहां अपराध और अपराधी बेलगाम नजर आए। 2006 में एस.टी.एफ.में एस.एस.पी रहे अमिताभ यश वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बाँदा जिले में डीआईजी के पद पर तैनात हैं। टीम वर्क में विश्वास रखने वाले निडर और बहादुर पुलिस अधिकारी अमिताभ यश से बात की हमारे चीफ एडिटर डा0 प्रदीप तिवारी ने, प्रस्तुत हैं उस बातचीत के प्रमुख अंश -


आप मूलतः कहां के निवासी है और आपकी प्रारम्भिक शिक्षा कहाँ पर हुई? 
मैं मूलतः भोजपुर बिहार का रहने वाला हूँ। मेरे पिता जी सरकारी नौकरी में थे और उनका स्थानान्तरण होता रहता था। जिसके कारण बचपन कई अलग-अलग जगहों पर बीता। मेरी प्रारम्भिक शिक्षा पटना,धनबाद और मुज्ज़फ्फरपुर में हुई। 10वीं मैंनें पटना से किया उसके बाद 12वीं की शिक्षा दिल्ली के डीपीएस की आर.के पुरम शाखा से की सेंट स्टीफेन्स कालेज से मैंने बी.एस.सी ;ऑनर्स किया। फिर आईआईटी कानपुर से एम.एस.सी ;केमिस्ट्री किया। 

आपको पुलिस सेवा में आने की प्रेरणा कहाँ से मिली ? क्या आपके परिवार में और भी लोग पुलिस प्रशासन में है ?
अपनी पढ़ाई के बाद तमाम आपश्न थे मेरे पास फिर भी लोगों से जानकारी लेने के बाद, अपने सीनियरों से गाइडेन्स लेने के बाद मैंने डिसाइड किया कि सिविल सेवा एक अच्छा आप्शन है। जिसमें देश सेवा की व कॅरियर एडवांसमेंट की तमाम सम्भावनाएं हैं। पुलिस बैकग्राउण्ड कि बात करें तो मैं देश का अकेला आईपीएस हूँ जिनके पिता और ससुर दोनों ही पुलिस सेवा में रहे है। मेरे पिता जी तो पुलिस में थे ही और जब शादी हुई तो मेरे ससुर भी पुलिस विभाग में कार्यरत थे। 

पुलिस विभाग में आपकी पहली पोस्टिंग कहां पर थी ?
मुझे मूलतः नागालैण्ड का आर्डर मिला था, मेरी पहली पोस्टिंग कोहिमा में हुई थी जहां मैं प्रशिक्षण आधीन था। प्रशिक्षण के बाद मेरी पहली रेगुलर पोस्टिंग मोकोकचुंग नाम के स्थान पर हुई थी। विवाह के बाद मेरा कैडर स्थानान्तरित होकर उ0प्र0 हो गया। जहां पर मैंने गोरखपुर एएसपी के पद पर ज्वाइनिंग की।

 
गोरखपुर के बाद कई जिलों में आपने कार्य किया। सबसे अधिक समय आपने किस शहर को और किस पद पर दिया ?
बहुत लम्बा समय तो मैंने कहीं व्यतीत नहीं किया। हाँ, जालौन में मैंने जरूर करीब 1 वर्ष तक अपनी सेवायें दीं। मैं जालौन को अपनी कर्मभूमि भी मानता हूँ क्योंकि यहां मुझे बहुत कुछ सीखने का अवसर मिला। पुलिस में सीखने का अवसर हर स्थान पर हर समय मिलता है। पर यहां पर मेरी ज्वाइनिंग के समय परिस्थितियां प्रतिकूल थी और प्रतिकूल परिस्थितियों में सबसे ज्यादा सीखने का मौका मिलता है। 2004 में मैं जब जालौन में पोस्टड हुआ तब वह जनपद 14 गैंग्स से प्रभावित था और अपहरण की घटनाएं तो अनगिनत थी। ऐसी परिस्थितियों में पुलिस का मोरॉल भी बहुत लो था। पुलिस की संख्या भी बहुत कम थी और पुलिस में लड़ने की क्षमता भी नहीं थी। ऐसी परिस्थितियों में उस क्षमता को क्रिएट करना और पुलिस को सक्षम बनाना एक बहुत बड़ी चुनौती थी।

उस वक्त जालौन में प्रमुख रूप से कौन-कौन से गैंग काम कर रहे थे ?
उस समय वहां कई गैंग्स थे और सभी सॉफिस्टिकेटेड असलहों से लैस थे। इनमें से निर्भय गूजर, अरविंद गूजर, पहलवान गूजर, जगजीवन सिंह परिहार, मुख्य गैंग थे। इसके अलावा और भी गैंग थे जिनसे जनपद प्रभावित रहता था। 
आपकी एसटीएफ में किस पद पर रहे 


आपकी एसटीएफ में किस पद पर रहे और कैसा कार्य अनुभव रहा।
जी, कालांतर मे मेरी पोस्टिंग 2007 मे एसटीएफ में एसएसपी के पद पर हुई। एसटीएफ में मुझे करीब सवा दो साल काम करने का मौका मिला और इस पोस्टिंग को मैं सबसे अच्छी और सफल पोस्टिंग मानता हॅूँ क्योंकि मुझे जो कार्य करने का मौका मिला, जिस प्रकार का एक्सपोजर मिला, जिस प्रकार की टीम मिली, जिस टीम भावना से काम किया गया वो अद्वितीय है। 

ऐसे किसी चैलेन्जिंग टास्क के बारे में बतायें जो आपको आज भी याद हो ?
कई चैलेजिंग टास्क रहे अभी तक, प्रमुख रूप से एक टास्क था जिसमें चित्रकूट बांदा, फतेहपुर क्षेत्र में दस्यु गैंग के सफाये का था और इस अभियान में काफी बड़ी संख्या में एसटीएफ की टीम ने डकैतों का सफाया किया और इस क्षेत्र को लगभग डकैतों से मुक्त करा दिया। परन्तु कालांतर में पुनः गैंग्स स्थापित हो गये हैं। उस समय एसटीएफ की टीम ने बहुत मेहनत से काम किया। कुशल रणनीति बनाकर काम किया। डिटरमिनेशन के साथ काम किया। पुलिस में ऐसी टीम भावना होना बहुत दुर्लभ है। 

पुलिस सेवा के दौरान क्या आपने कभी राजनीतिक हस्तक्षेप का सामना किया है ?
इस प्रकार की समस्या को मैंने लोगों से सुना जरूर है लेकिन कभी सामना नहीं किया। इस बात की मैंने कभी भी अनुभूति नहीं की किसी भी प्रकार के दबाव के कारण मुझे अपराधियों के विरूद्ध कार्यवाही करने में कोई भी समस्या नहीं आई। ये मेरा व्यक्तिगत अनुभव है। 

चुनाव के वक्त अपनी बांदा जैसे जिले में पोस्टिंग को आप कैसा मानते हैं?
देखिये, बुन्देलखण्ड में चुनाव कराना हमेशा से चुनौती रहा है। चुनाव कराने में जो दिक्कतें आती हैं वो ज्यादातर उन क्षेत्रों में आती हैं जहां दूरियां अधिक होती हैं, जहां इन्फ्रास्ट्रक्चर कमजोर होता है, सड़क आदि कि सुविधाएं कमजोर होती हैं, वहां चुनाव कराना मुश्किल होता है। इसके अलावा दुर्गम क्षेत्र हो, पिछड़ा क्षेत्र हो, समस्या ग्रसित क्षेत्र हो तो भी चुनाव कराने में अतिरिक्त मुश्किलें आती है। इन सब के साथ ही अगर कोई आपराधिक समस्या मौजूद हो, तो दिक्कतें और बढ़ जाती है। 

पहले के समय में चुनाव के वक्त गैंग्स सक्रिय हो जाते थे, क्या जो गैंग अभी मौजूद है उनसे भी इसी प्रकार का खतरा रहा ?
पूर्व में यहां गैंग्स का बहुत नियंत्रण था, पूरे सामाजिक जीवन पर गैंग्स का प्रभाव बना रहता था, अभी ऐसी स्थिति नहीं है जहां तक मैं समझता हॅँं चुनाव की इस प्रक्रिया को कोई भी दूषित नहीं कर पाया।

आप कानपुर में भी रहे, आज आप बांदा के पुलिस उपमहानिरीक्षक है और जगह और यहां के अपराध में किस प्रकार का अंतर देखा आपने, क्या यहां अपराध का ग्राफ ज्यादा है ?
उ0प्र0 में हर जिला एक दूसरे से अलग है यह उ0प्र0 की विविधता है। आप आस-पास के जिलों में भी लोगों की सोच में अंतर देखेंगे तो उसी तरह अपराध में भी अन्तर देंखेगे और इसीलिए पुलिस के कार्य में भी अन्तर है। इस क्षेत्र में ज्यादातर अपराध लूट व डकैती के हैं, लेकिन उनकी संख्या अभी इतनी नहीं है। पुलिस अगर अपनी सक्रियता बढ़ाये, तो इन पर लगाम लगाया जा सकता है। यहां पर बिजली आदि की व्यवस्था, पढ़ाई की व्यवस्था इतनी मजबूत नहीं है चूंकि यहाँ क्षेत्र दुर्गम है, पुलिस का वहां तक जाना दुर्गम हो जाता है। उन क्षेत्रों में अक्सर अपराध हो जाते है, पाठा इसी प्रकार के गैंग के लिए जाना जाता रहा है। 

यहां थाने और चौकिंया दूर-2 है, आपके अनुसार क्या चौकियों की संख्या बढ़नी चाहिए या नहीं ?
पुलिस व्यवस्था के सुधार में थानों की संख्या बढ़ना, उनको सही इम्प देना, सही बैकअप देना ये सब आवश्यक है खासकर की पाठा क्षेत्र में पुलिस व्यवस्था उतनी नहीं है जितनी कि होनी चाहिए। 

ग्रामीण क्षेत्रों में आप थाना दिवस या जनता दर्शन इस प्रकार के कार्यक्रम करते है, जिससे पुलिस व जनता के बीच संवादहीनता दूर हो सके।
जी हांँ, हमारे यहां थाने स्तर पर भी जनता की समस्यायें सुनी जाती है और उसका निस्तारण भी किया जाता हैं और ये कोशिश भी की जाती है कि क्षेत्र के व्यापारी और जनता सभी पुलिस से लगातार सम्पर्क में रहते है। हम इस पर भी फोकस करते है कि वो बेबाक होकर पुलिस से अपनी बात कह सकें। जिससे पुलिस का सर्विस ओरिएन्टड चेहरा जनता के समक्ष पेश हो सके।
 
पुलिस महकमें में किस प्रकार के सुधार की आवश्यकता है ?

डीआईजी के पद पर मेरे लिए ये बहुत आवश्यक है, कि पुलिस इंस्टीटयूट को बहुत सशक्त किया जाये और इसके लिए ये बहुत जरूरी है, कि जो पुलिस के काम करने के तरीके है, पुलिस की गांवों तक पहुंच व लोगों से सवांद कर छोटी-छोटी समस्याओं और विवादों का निस्तारण, अपराधियों का चिन्हीकरण, ये सभी एक सिस्टमैटिक तरीके से होना चाहिए।

आपके परिवार में कौन-कौन हैं ?
मेरे परिवार में मेरे माता-पिता, चार भाई व एक बहन है। मेरी धर्म पत्नी भी सरकारी सेवा में और मेरी दो बेटियाँ है। 

हमारे माध्यम से जनता को कोई सन्देश होना चाहेंगे ?
मैं ये प्रयास कर रहा हूँ कि पुलिस की सेवाएं निष्पक्ष रूप से सभी नागरिकों को मिले। पुलिस उनकी सभी समस्याओं के हल करने का प्रयास करेगी और पुलिस आपके माध्यम से जनता से ये अनुरोध करती है कि अगर आपके पास कोई सूचना है तो पुलिस को जरूर अवगत करायें हमारा प्रयास है कि इस क्षेत्र में भय मुक्त समाज हो, ताकि इस क्षेत्र का समुचित विकास हो सके

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